SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 50
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३९ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १८२ संयोगस्वरूपनिरूपणम् मायया मायी, लोमेन लोभी। स एषोऽपशस्तः। स एष भावसंयोगः। तदेतत् संयोगेन ।मु०१८१॥ टीका-'से कि तं' इत्यादि अथ किं तत् संयोगेन ? संयोगेन यन्नाम निष्पद्यते तत् किम् ? इति शिष्य प्रश्नः । उत्तरयति-संयोगो हि द्रव्यसंयोग-क्षेत्रसंयोगकालसंयोगभावसंयोगभेदेन चतुर्विधः। तत्र-द्रव्यसंयोगः सचित्ताचित्तमिश्रभेदेन त्रिविधः प्रज्ञप्तः । तत्र सचित्तद्रव्यसंयोगेन-गोमान् महिषीमान् इत्यादि नाम निष्पद्यते । अचित्तद्रव्यसंयोगेनछत्री दण्डीत्यादि । मिश्रद्रव्यसंयोगेन-हालिका शाकटिक इत्यादि। अत्र हलादीनामचेतनत्वं बलीव दीनां सचेतनत्वमितिमिश्रता बोध्या, एवंविधानि नामानि द्रव्यसंयोगजानि विज्ञेयानि । क्षेत्रसंयोगेन भरतैरण्यवतादीनि मागधमालवकादीनि वा नामानि निष्पधन्ते। कालसंयोगेन-सुषमसुषमाजादीनि प्रावृषिकादीनि वा निष्पन्न होता है, वह प्रशस्त भाव संयोगज नाम है । (से किं तं अपसत्थे) हे भदन्त ! अप्रशस्त भाव कौन है ? उत्तर-(अपसत्थे) अप्रशस्त भाव इस प्रकार है । (कोहेणं कोही, माणेणं माणी, मायाए मायी, लोहेणं लोही, से तं अपसस्थे) क्रोध, मान, माया, और लोभ ये अप्रशस्त भाव हैं। इनके संबंध को लेकर यह क्रोधी है, यह मानी है, यह मायावी है, यह लोभी है। तात्पर्य यह है कि क्रोध के संबन्ध से क्रोधी मान के संबन्ध से मानी आदि नाम निष्पन्न होते हैं । ये सब ज्ञान आदि और क्रोध आदि आत्मा के ही प्रशस्त और अप्रशस्त भाव हैं। (से तं भावसंजोगे) इस प्रकार यह भाव संयोगज नाम है। (से तं संजोगेणं) इस प्रकार प्रशस्त मा सयो नाम छ. (से कि त अपसत्थे) महत! અપ્રશસ્ત ભાવે કયા કયા છે? उत्तर-(अपसत्थे) अप्रशस्त लावा प्रमाणे छे. (कोहेणं कोही माणेणं माणी, मायाए मायी, लोहेणं लोही, से त अपसत्थे) अष, मान, माया भने લાભ આ બધા અપ્રશસ્ત ભાવે છે. આ ભાવના સંબંધથી આ કોપી છે, આ માની છે, આ માયાવી છે આ લેભી છે એવાં નામે નિષ્પન્ન થાય છે. તાત્પર્ય આ છે કે ક્રોધના સંબંધથી ક્રોધી, માનના સંબંધથી માની વગેરે નામે નિષ્પન્ન થાય છે. આ બધા જ્ઞાન વગેરે અને ક્રોધ વગેરે આત્માના प्रशस्त मा प्रशस्त साव छ. (से त भावसंजोगे) मा प्रभारी मा मा१ सयोग नाम छ. (से तं संजोगेण) मा प्रभारी संयोग
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy