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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २१६ मनुष्याणामौदारिकादिशरीर निरूपणम् ४३५ कालतः संख्येयानि वद्धवैकिपशरीराणि बोध्यानीति । वैक्रियशरीरापहारस्तु निदशनमात्रं बोध्यः । वस्तुतस्तु न तान्यषहियन्ते । अनुमेवार्थं दर्शयति-नो चैत्र खलु अपहृतानि स्युरिति । मुक्तवेक्रियशरीराणि मुक्तौधि कौदारिकशरीरद् बोध्यानि । तथा - एतेषामाहारकशरीराणि बद्धमुक्तेति द्विविधानि । द्विविधान्यप्येतानि औधिकचद् बोध्यानि । तेजस फार्म कशरीराणि तु एतेषामौदा रिकशरीरवद् बोध्यानीति ॥ सू० २१६ ॥ व्यतीत होते हैं । यह जो वैक्रियशरीर का अपहार कहा गया है वह एक उदाहरण मात्र है । वास्तव में इनका अपहार नहीं होता है । यही बात सूत्रकार ने (णो चेत्र णं अवहिया लिया) इस मूत्रपाठ द्वारा प्रकट की है । (मुक्केल्लया जहा ओहिया ओरालियाणं मुक्केल्लया तहा भाणिव्या) मुक्त वैक्रिवशरीरों का प्रमाण मुक्त सामान्य औदारिक शरीर के जैसा अनंत जानना चाहिये । (मणुस्साणं भंते ! केवइया आहारगसरीरा पण्णत्ता ?) हे भदन्त ! मनुष्यों के आहरक शरीर, प्रमाण में कितने कहे गये हैं ? (गोयमा !) हे गौतम ! (आहारगसरीरा दुबिहा पण्णत्ता) आहारक शरीर दो प्रकार के कहे हुए हैं । (तं जहा ) जैसे बद्धेल्लया य मुक्केल्लया य) एक बद्ध आहारक शरीर और दूसरे मुक्त आहारक शरीर । (तत्य णं जे ते बद्धेल्लया तेणं सिय अस्थि सिय नस्थि) इनमें जो वे बद्ध आहारक शरीर है वे मनुष्यों के होते भी हैं और नहीं भी होते है । (जइ अस्थि जहन्नेर्ण एक्को वा दो वा तिष्णि वा થઈ જાય છે. જે આ વૈયશરીના અપહાર કહેવામાં આળ્યેા છે, તે સ્ત એક ઉદાહરણ માત્ર છે. ખરેખર એમના અપહાર સ‘ભવતા નથી. એ જ વાત सूत्र (जो चेव णं अवहिया सिया) मा सूत्रपाठ वडे अट वामां भांबी (मुक्केल्ल्या जहा ओहिया ओरालियाणं मुक्केल्ल्या तहा भाणियव्वा) भुत वैडिय શરીરનું પ્રમાણ મુકત સામાન્ય ઔકારિક શરીરાની જેમ અનંત જાણવુ જોઈએ. (मगुरुला णं भंते ! केत्रइया आहारगसरोरा पण्णत्ता १) डे लहांत ! मनुष्योना भाडारऊ शरीरे। प्रभाशुभ वामां भाव्यां १ (गोयमा !) हे गौतम ! (आहारगसरी दुविधा पण्णत्ता) २४ शरीश मे प्राश्नां वामां मांव्यां छे. (तं जहा) प्रेम है (बद्वेल्लया य मुक्केल्लया य) में मद्ध आहार शरीर याने भुक्त भाडा२४ शरीर (तत्थ णं जे ते बद्धेल्लया तेणं सिय अस्थि: प्रिय णत्थि ) यामां ने मद्ध આહારક શરીર છે તે મનુષ્યા ને હાય પણ भरा भने नथी पशु डेत (जइ अस्थि जहन्नेणं एक्को वा दो वा तिष्णि वा) अ० ५९ 1
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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