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________________ ४६४ अनुयोगद्वारसूत्र वैक्रियशरीराणि बद्धमुक्तेति द्विविधानि । तत्र खलु यानि तानि बद्धानि तानि खलु संख्येयानि । तानि एतानि बद्धानि क्रियशरीराणि समये समये एकैकशो ऽपहियमाणानि अपहियमाणानि संख्येयेन कालेनापहियन्ते । अयं भावःवैक्रियशरीरलब्धियोग्यता गर्भजानामेव संभवति । तत्रापि वैक्रियशरीरलब्धिस्तु केषांचिदेव मनुष्याणां संतति । सानि बद्ध क्रियशरीराणि भतिसमयमेकैकशोऽपहियमाणानि अपहियमाणानि संख्यामून्सपिण्यवसर्पिणीषु अपहियन्ते, अत: भंते ! केवड्या वे उब्वियसरीरा पण्णता ?) हे भदन्त ! अनुष्यों के कितने प्रमाण में वैक्रियशरीर कहे गये हैं ? (गोयमा !) हे गौतम ! (वेवियसरीरा दुविहा पण्णत्ता) बैक्रिय शरीर दो प्रकार के कहे गये हैं । (तं जहा) जैसे-(बद्धेल्लया य मुक्केल्लया) एक बद्ध और दूसरे मुक्त । (तत्थ णं) इनमें (जे ते श्रद्धेल्लया) जो वे बद्ध वैक्रिय शरीर हैं । (तं ण) वे (संखिज्जा) सामान्यरूप से संख्यात हैं। (समए समए अवहीरमाणा अबहीरमाणा संखेज्जेणं कालेणं अवहीरंति) एक एक समय में इनका एक एक का अपहार करने पर संख्यात काल में इनका अपहार होता है। तात्पर्य इसका यह है-कि वैक्रियशरीरलब्धि योग्यता गर्भजों के ही होती है। इसमें भी यह वैक्रियशरीर लब्धि किन्हीं २ ही मनुष्यों में होती है। ये काल की अपेक्षा संख्यात इसलिये कहे गये हैं कि एक एक समय में इनका एक एक करके यदि अपहार' निकालनाकिया जावे तो उसमें संख्यात उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल शनी २५ मत . ( मणुस्सा गंभंते ! केवइया वेउषियसरीरा पण्णत्ता) હે ભદંત! મનુષ્યોના કેટલા પ્રમાણમાં વૈક્રિયશરીર કહેવામાં આવ્યાં છે ? (गोयमा ?) 3 गीतमाहे (वेसव्वियसरीरा दुविहा पण्णत्ता) वैयिशरीश मे मारना अwi मायां छे. (तं जहा) २ (बद्धेल्लया य मुक्केल्लया य) प्रथम मद्ध भने द्वितीय भुत (तत्थण) मामा (जे ते बद्धेल्लया) २ पर वैठिय शरी। छे. (ते ण) ते (सं खिज्जा) सामान्य ३५थी सध्यात छे. (समए समए अवहीरमाणा अवहीरमाणा संखेज्जेणं कालेणं अवहीर'ति) मे એક સમયમાં એમને અપહાર કરવાથી સંખ્યાત કાળમાં એમનો અપહાર થાય છે. તા-પેય આ પ્રમાણે છે કે વૈક્રિયશરીર લબ્ધિની યોગ્યતા ગર્ભ જેની જ હોય છે. આમાં પણ આ વિક્રિયશરીર લબ્ધિ કઈક કઈક મનુષ્યમાં જ હોય છે. આ બધા કાળની અપેક્ષાથી સંખ્યાત એટલા માટે કહેવામાં આવ્યાં છે કે એક એક સમય માં એમને એક એક કરીને જે અપહાર નિકાલ કરવામાં આવે છે તેમાં સંખ્યાત ઉત્સર્પિણી અવસર્પિણી કાળ પસાર થઈ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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