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________________ ४२८ अनुयोगद्वार सूत्रे भदन्त ! क्रियन्ति वैक्रियशरीराणि प्रज्ञप्तानि ? गौतम ! वैक्रियशरीराणि द्विविधानि प्रज्ञप्तानि तद्यथा - बद्धानि च मुक्तानि च । तत्र खलु यानि तानि बद्धानि तानि खलु असंख्येयानि समये समये अपहियमा गानि अपह्रियमाणानि क्षेत्रपल्योपमस्य असंख्येयभागमात्रेण कालेन अपह्रियन्ते नो चैव खलु अपहृतानि स्युः । मुक्तानि शरीर कहे गये है- अर्थात् पृथिवीकायिक जीवों में बद्ध औदारिक शरीर असंख्यात और मुक्त औदारिक शरीर अनन्त होते हैं उसी प्रकार ये बद्ध मुक्त औदारिक शरीर: वायुकाधिक जीवों में भी इतने ही होते हैं (याउकाइयाणं भंते ! केवइया वेडव्यियसरीरा पण्णत्ता) हे भदन्त ! वायुकाधिक जीवों में वैक्रिय शरीर कितने होते हैं ? (गोमा !) हे गौतम ! (वेउव्धियसरीरा दुविहा पण्णत्ता) वैक्रिय शरीर दो प्रकार के कहे गये हैं- तं जहा) वे थे हैं (यद्वेल्लया थ मुक्केल्लया य ) एक बद्ध वैक्रिपशरीर और दूसरे मुक्त वैक्रिय शरीर (तत्थ णं जे ते बद्धेल्लया तेणं असंखिज्जा) सो इनमें जो वे बद्धवैक्रिय शरीर हैं वे असंख्यात होते हैं । (समए समए अबहीरमाणा अवहीरमाणा खेत्तपलिओवमस्स असंखिज्जइभागमेत्तेण कालेणं अवहीरंति, नो चेव णं अवहिया सिया) असंख्य तपना इनमें इस प्रकार से हैं कि-'यदि ये शरीर एक समय में निकाले जावें तो क्षेत्र पत्थोपम के असंख्यातवें भाग में जितने आकाश के प्रदेश होते हैं उतने प्रमाण समयों में थे निकाले जा (जहा पुढविकाइयाणं ओरालियखरीरा पण्णत्ता तहा भाणियन्त्रा) पृथिवीयिष्ठ જીવાની જેમ ઔદારિક શરીરા કહેવામાં આવ્યાં છે. એટલે કે પૃથિવીકાયિક જીવામાં બદ્ધ ઔદારિક શરીરા અસ`ખ્યાત અને મુંકત ઔદ્યારિક શરીરે અનંત હાય છે, તેમજ આ ખદ્ધ મુકત ઔદારિક શરીરા વાયુકાયિક વામાં પણ मासांनं हाय छे. (वाउकाइयाणं भंते! केवइया वेउव्वियसरीरा पण्णत्ता) लहत] वायु वामां वैडियशरीर डेंटला होय छे ? ( गोयमा ! हे गौतम! (वेडब्बियसरीरा दुविहा पण्णत्ता) वैडियशीरा में अहारना वामां खाव्यां छे. (तजहा) ते अ प्रभा छे (बद्वेल्लया य मुक्केल्ल्या य) मे जद्ध वैडिशरीर अने मी भुक्त वैडिय शरीर (तत्थ णं जे वे बद्धल्लया तेणं असंखिज्जा) ते! आमां ने मद्ध वैडिय शरीरो छे ते असण्यात हाय छे. (are समए अबहीरमाणा अवहीरमाणा खेत्तपलिओ मस्स असंखिज्जइभागमेत्ते णं कालेज अहीरंति, नो चेव णं अवहिया खिया) असण्यातया आभां भी પ્રમાણે છે કે જો આ શરીરા એક એક સમયમાં બહાર કાઢવામાં આવે તે ક્ષેત્ર પલ્યાપમના અસખ્યાતમાં જેટલા આકાશના પ્રદેશ હાય છે, તેટલા -
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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