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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २१२ ओघतो वैक्रियादिशरीरसंख्यानिरूपणम् ४५ जे ते बद्धेलया ते णं अणंता अणंताहिं उस्लप्पिणी ओसटिक णाहिं अवहीरंति कालओ, खेत्तओ अणंता लोगा, दवओ सिद्धेहि अणंतगुणा सव्वजीवाणं अणंतभागूणा। तत्थ णजे ते मुक्केल्लया ते गं अणंता अणंताहिं उस्सप्पिणी ओसप्पिणीहि अवहीरंति कालओ, खेत्तओ अर्णता लोगा, दवओ सटकजीवेहिं अणंतगुणा सव्वजीववग्गस्स अणंतभागे। कैवइयाणं भंते ! कम्मयसरीरा पण्णता? गोयमा! कम्मयसरीरा दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-बद्धेल्लया य मुक्केल्लया य। जहा तेषगसरीरा तहा कम्मगसरीरावि भाणियत्वा ।सू०२१२॥ छाया-कियन्ति खलु भदन्त ! वैक्रियशरीराणि भज्ञतानि ? गौतमः ! वैक्रियशरीराणि द्विविधानि प्रज्ञतानि, तद्यथा-बद्धानि च मुक्तानि च। तत्र खल यानि तानि बद्धानि तानि खलु असंख्येयानि असंख्येयाभिः उत्सर्पिण्यवसपिणिभिः ___अब सूत्रकार ओघ की अपेक्षा वैक्रिय आदि शरीरों की संख्या निरूपित करते हैं-"केवइया णं भंते । वेउन्धियसरीरा पण्णत्ता" इत्यादि। शब्दार्थ--(भंते !) हे भदन्त ! (वेउब्धियसरीरा) वैक्रिय शरीर (केवइयाणं पण्णत्ता) कितने प्रकार के कहे गये है ? (गोयमा) हे गौतम! (वउब्वियसरीरा दुविहा पण्णत्ता) वैक्रिय शरीर दो प्रकार के कहे गये हैं। (त जहा) जैसे-(बद्धेल्लया य मुक्कैल्लयाय) एक बद्ध वैक्रियशरीर और दूसरे मुक्त क्रियशरीर । (तस्थ णं जे ते बद्धेल्लयो तेणं असंखिज्जा) इनमें जो बद्ध वैनियशरीर हैं, वे सामान्य से असंख्यात हैं। (असंलि. હવે સૂત્રકાર એવની અપેક્ષા વૈકિય વગેરે શરીરની સંખ્યા નિરपितरे छ-" केवइयाणं भंते । वेउब्वियसरीरा पण्णत्ता " स्या शहाथ-(भंते !) 3 AdI (वेठब्वियसरीरा) वैठियशरी। वह याणं पण्णत्ता) dal प्रना अपामा माया छ ? (गोयमा) 3 गीत। (वेबियसरीरा दुविधा पण्णत्ता) वैठियशरीश ने प्रान पाम 49. (तंजहा) २४ (बबेल्लया मुक्केल्लयाय) ४ मा वैशिष गरी भुत वक्ष्य शरी२ (तत्थ णं जे. बद्धलयाय तेणे अखंसिल) मा वय शरी। छ, त सामान्यथी असण्यात के. (असखिजाहिं उस्माभिधीमो.
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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