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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २०७ असुरकुमारादीनामायुःस्थितिनिरूपणम् ३१७ उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि । अपर्याप्तकगर्भव्युत्क्रान्तिकचतुष्पदस्थलचरपञ्चे. न्द्रियतिर्यग्योनिकानां पृच्छा, गौतम ! जघन्येनापि अन्तर्मुहूर्तम् , उत्कर्षेणापि अन्तर्मुहूर्तम् । पर्याप्तकगर्भव्युत्क्रान्तिकचतुष्पदस्थलचरपञ्चेन्द्रियनियंग्योनिकानां पृच्छा, गौतम ! जघन्येन अन्तर्मुहूर्तम् , उत्कर्षेग त्रीणि पल्योपमानि अन्तर्मुहूर्तीनानि । उरःपरिसर्पस्थलचरपञ्चेन्द्रिगतियायोनिकानां पृच्छा, गौतम ! जघन्येन अन्तर्मुहूर्तम् , उत्कर्षण पूर्वकोटिः । संन्छि मोर परिसर्पस्थलचरणियाणं पुच्छा-गोयमा ! जहण्जेणं अंतोमुंहुत्त उक्कोसेणं तिणि पलि ओवमाई) गर्भजन्मवाले जो चतुष्पद थलचर पंचेन्द्रिय तिर्यश्चजीव हैं, उनकी जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की है और उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्योपम की है (अपज्जत्तगगन्भवतिय चउप्पयथयरपंचिंदियतिरि• क्खजोणियोणं पुच्छो-गोयमा ! जहण्णेण वि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण वि अंतोमुहुत्त) गर्भजन्मवाले जो चतुष्पद्यलचरपंचेन्द्रियतियश्चजीव अपर्याप्तक हैं, उनकी जघन्य स्थिति भी अंतर्मुहूर्त की है और उस्कृष्ट स्थिति भी अंतर्मुहूर्त की है। (पज्जत्तगगम्भवक्कंतिथच उपयथलयर पंचिंदिय तिरिक्ख जोणियाणे पुच्छा, गोयमा.! जहण्णणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं अंतो मुहुत्तूगाई तिणि पलिओवमाई) गर्भजन्मवाले जो चतुष्पद थलचरपंचेन्द्रिय तिर्यश्च जीव पर्याप्तक हैं, उनकी जघन्य स्थिति तो अंतर्मुहूर्त की है और उत्कृष्ट स्थिति अंतर्मुहूर्त कम तीन पल्योपम की है। (उरपरिसप्पथलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाण पुच्छाचप्पयथलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा-गोयमा ! जहण्णेणं अतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिण्णि पलिओवमाइ) माणा २ यतु०५६ क्षयर પંચેન્દ્રિય તિર્યંચ જીવે છે, તેમની જઘન્ય સ્થિતિ અંતમુહૂર્ત જેટલી છે भर सट स्थिति ay पक्ष्यापम २क्षी छ. (अपज्जत्तगगम्भवक्कं. तियच उत्पयथलयरपंचिदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा-गोयमा ! जहण्णेणं वि अंतोमहत्तं उक्कोखेण वि अंतोमुहुत्तं) . माण२ यतु५४ सयर પંચેન્દ્રિય તિર્યંચ છો અપર્યાપ્તક છે, તેમની જઘન્ય સ્થિતિ પણ અંતमहतनी छ भने स्थिति ५५ मत इतनी छे. (पज्जत्तागभः वतियच उपयथलयरपंचिदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा । जहणेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं अतोमुहुत्तलाई तिणि पलिओवमाइ) सस જન્મવાળા જે ચતુષ્પદ થલચર પંચેન્દ્રિય તિર્યંચ છ પર્યાપ્ત છે, તેમની જઘન્ય સ્થિતિ તે અંતર્મુત્તની છે અને ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ અંતર્મુહૂર્તન્યૂન ३ ५।५ २८वी . छे. (उरसरिसप्पथलयरपंचें दियतिरिक्खजोणियाण
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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