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________________ - ३१० अनुयोगद्वारसूत्रे बादरवनस्पतिकायिकानां जघन्येन अन्तर्मुहूर्तम्, उत्कर्षेण दशवर्ष सहस्राणि । अपर्याप्तकबादरवनस्पतिकायिकानां जघन्येनापि अन्तर्मुहूर्वम् , उत्कर्षेणापि अन्तर्मुहूर्तम्। पर्याप्तकबादरवनस्पतिकायिकानां जघन्येन अन्तर्मुहूर्तम् उत्कर्षेण दशवर्षसहस्राणि अन्तर्मुहूतानानि । द्वीन्द्रियाणां भदन्त । कियन्तं कालं स्थितिः प्रज्ञप्ता ? गौतम जघन्येन अन्तर्मुहूर्तम् , उत्कर्षेण द्वादशसंवत्सरान् । अपर्याप्तकद्वीन्द्रियाणां जीवों की स्थिति जघन्य से और उत्कृष्ट से एक अन्तर्मुहूर्त की है। (बादरवणस्तइकाइयाणं जहण्णेणं अंगो मुहत्तं उक्कोसेणं दसवास सहस्साई) बादरवनस्पतिकायिक जीवों की स्थिति जघन्य से एक अन्तर्मुहूर्त की है और उत्कृष्ट से दस हजार वर्ष की है। (अपज्जत्तग बादरवणस्तइकाइयाणं जहण्णेग वि अंतोमुहूतं उक्कोसेण वि अंतोमु. हुत्तं) अपोसक पादरवनस्पतिकाधिक जीवों की स्थिति जघन्य से भी एक अंतर्मुहूर्त की है और उत्कृष्ट से भी एक अन्तर्मुहूर्त की है। (पज्जत्तगपादरवणसइकाइयाणं जहणणं अंगोमुत्तं उकोसेणं दसवाससहस्साई अंतोमुत्तूगाई) पर्यातक पादर वनस्पतिकायिक जीवों की जघन्य से स्थिति तो एक अन्तरमुहूर्त की है और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त कम दश हजार वर्ष की है । (वेह दिया णं भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता) हे भदन्त ! बीन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल तक की कही गई है ? .. उत्तर-(गोयमा ! जहणणं अंतो मुहुत्तं उक्कोसेणं बारस संबच्छવનસ્પતિકાયિક જીવની સ્થિતિ જઘન્યથી અને ઉત્કૃષ્ટથી એક અcહત્ત २सी छ. (बादरवणस्सइकाइयाण जहण्णेण' अंतोमुहत्तं उक्कोसेण दसवाससहस्साई) मा ५तिथि: वानी स्थिति धन्यथा मे अन्त इतना छ भने यी १० M२ १२वी . (अपज्जत्तगबादरवणस्सइकाइयाण जहण्णेण वि अंतोमुहुत्तं उनकोखेण वि अंतोमुहुत्तं) अ५ मा वनस्पति४ि જીની સ્થિતિ જઘન્યથી પણ એક અંતમુહૂર્તની છે. અને ઉત્કૃષ્ટથી પણ એક मतभुत ना छे. (पज्जत्तगबादरवणस्पइकाइयाण जहण्णेण अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण सवामसहस्वाइं अंतोमुहूतूणाई) ५ ६२ बन३५तिथि: वानी ru. ન્યની અપેક્ષાએ સ્થિતિ તે એક અંતમુહૂર્તની છે અને ઉત્કૃષ્ટથી અંતમુહૂર્ત हम 6m२ १ २८क्षी छ. (बेइंदियाण भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता) ભત! શ્રીન્દ્રિય ની સ્થિતિ કેટલા કાલ સુધીની કહેવામાં આવી છે? उत्तर-(गोयमा ! जहण्णेण' अंतोमुहुत्तं उक्कोण बारससंवन्छराणि) 3
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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