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________________ अनुयोग वन्द्रिका टीका सूत्र २०१ अंरकुमारादी नामायुःस्थितिनिरूपणम् ३०९ सहस्राणि । अपर्याप्तकबादरवायुकायिकानां जघन्येनापि अन्तर्मुहूर्तम्, उत्कर्षे. णापि अन्तमुहूर्तम् । पर्याप्तकबादरवायुकायिकानां जघन्येन अन्तर्मुहूर्तम् उत्कर्षण त्रीणि वर्षसहस्राणि अन्तर्मुहूर्वोनानि । वनस्पतिकायिकानां जघन्येन अन्तर्मुहू तम्, उत्कर्षेण दशवर्षसहस्राणि । सूक्ष्मवनस्पतिकायिकानाम् औधिकानाम् अपर्याप्तकानां पर्याप्तकानां च त्रयाणामपि जघन्येनापि अन्तर्मुहूर्तम्, उत्कर्षेणापि अन्तर्मुहूर्तम् । तिणि वाससहस्साई) चादर वायुकायिक जीवों की स्थिति जघन्य से एक अन्तर्मुहूते की है और उत्कृष्ट से तीन हजार वर्ष की है। (अपज्जत्तगवादरवाउकाइयाणं जहन्नेण वि अंतोमुत्तं उक्कोसेण वि अंतोमुष्टुतं) अपर्याप्तक बादरवायुकायिक जीवों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति एक अन्तर्मुहूर्त की है । (पज मस्सग वादवायुकाइयाणं जहण्णर्ण अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं तिणि वाससहस्साई अंतोमुखत्तूणाई) पर्यातक वायुकायिक जीवों की जघन्य से तो स्थिति एक अन्तर्मुहूर्त की है और उस्कृष्ट से अन्तरमुहूर्त कम तीन हजार वर्ष की है । (वणस्सइकाइयाणं जहणणं अंतो मुहत्तं उक्कोसेणं दसवाससहस्साई) वनस्पतिकायिक जीवों की स्थिति जघन्य से एक अन्तर्मुहूर्त की है और उत्कृष्ट से दस हजार वर्ष की है। (सुहमवणस्सइकाइयाणं ओहियाणं अपज्जत्तगाणं पज्जत्तगाणय तिण्ह वि जहण्णे वि अंतो मुहुत्तं उक्कों सेण वि अंतो मुहुत्तं) सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीवों की अपर्याप्तक वनस्पतिकाधिक जीवों की और पर्याप्तक वनस्पतिकायिक सहस्साई) मा २ वायुायि वानी स्थित न्यथा से अन्त इतना छ भर ७४थी ३ २ २८ी छ (अपज्जत्तगबादरवाउकाइयाणं जहन्नेण वि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण वि भंतोमुहुत्त) सात माह२वायुायि वानी धन्य भर gbe स्थिति मन्तभुत सी छे. (पज्जत्तगबादरवायुकाइयाणं जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं उस्कोखेण' तिणि वाससहस्साई अंसोमहत्त. ળા) પર્યાપ્ત વાયુકાયિક જીવની જઘન્યથી તે એક અંતહ જેટલી સ્થિતિ છે. અને ઉત્કૃષ્ટથી અન્તર્મુહૂર્તા કમ ત્રણ હજાર વર્ષ જેટલી છે. वसकाइयाणं जहण्णण अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण दसवाससहस्साई) वनस्पतिકાયિક જીવેની સ્થિતિ જઘન્યથી એક અન્તમુહૂર્ત જેટલી છે અને ઉત્કૃષ્ટથી ६२ २ १ २८०ी छे. (सहुमवणस्सइकाइयाण ओहियाण अपज्जत्तगाण' पज्जत्तगण य तिण्ह वि जहण्णेण वि अंतोमुहुत्तं उकोसेण वि अंतोमुहुत्तं ) सूक्ष्म વનસ્પતિકાયિક જીવોની અપર્યાપ્તક વનસ્પતિકાયિક, જીની અને પર્યાપ્તક
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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