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________________ २६६ अनुयोगद्वारसूत्रे नास्ति कश्चिद् दोषः । एवं बादराद्वापल्योपमादावपि बोध्यम् । एतदुपसंहनादतदेतद् व्यावहारिकमुद्धारपल्योपममिति । अथ - सूक्ष्मम् उद्धारपल्योपमं प्ररूपणाय पृच्छति-अय किं तद् सूक्ष्मम् उद्धारपल्योपमम् ? इति । उत्तरयति - ' सुहुमं उद्धारंपलियोत्रमं इत्यादिना । तत्र - मूक्ष्ममुद्धारपल्योपममित्यारभ्य भृतं वालाग्र कोटीनाम् ' इत्यन्तस्य पाठस्यार्थः पूर्ववद् बोध्यः । तत्र=वालाग्रकोटिषु खलु एकैकं वालाग्रम् असंख्येयानि खण्डानि क्रियते । पूर्वं वालाग्राणि सहजान्येव जन एक अल्प प्रयोजन है । अतः सूत्रकारने इस अल्पप्रयोजन की वहाँ विवक्षा नहीं की है, इस अपेक्षा उसे प्ररूपणा मात्र बतला दिया है । इसी प्रकार से बादर अद्धापल्पोपत्र आदि में भी जानना चाहिये । ( से तं वावहारिए उद्धारपलिओ मे) इस प्रकार यह व्यावहारिक उद्धारपत्योपमं का स्वरूप है । (से किं तं सुहमे उद्धारपलिओ मे ?) हे भदन्त ! वह सक्ष्म उद्धारपत्योपय क्या है ? 6. C उत्तर--(सुहुमे उद्धारपलिओवमे) वह सूक्ष्म उद्धारपल्योपम इस प्रकार से हैं (से जहा नामए पल्ले सिया जीवणं आयामविवखंभेणं जोयण तं तिगुणं सविसेसं परिवखेवेणं) जैसे कोई एक पल्य हो और वह लंबाई में चौडाई में एवं गहराई में एक योजन प्रमाण हो । इसकी परिधि कुछ अधिक तीन योजन की हो। (से गं पल्ले एगोहिय. बेवाहियतेयाहिय जाव सत्तरप्तरूढाणं संसट्टे संनिचिए भरिए बालगंग ઉત્તર—સૂક્ષ્મની પ્રરૂપલામાં આ ઉપયેગી છે, તે આ ઉપચેાગિતા રૂપ પ્રત્યેાજન એક રીતે અલ્પ પ્રયજન જ છે. એથી સૂત્રકારે આ અલ્પ પ્રાજનની ત્યાં વિક્ષા કરી નથી આ દૃષ્ટિએ જ તેને પ્રરૂપણા માત્ર કહી દીધી છે એ પ્રમાણે અંદર અદ્ધા પલ્યાપમ વગેરેના સબંધમાં પણ સમજી લેવું लेथे. ( से तं बावहारिए उद्धारपलिओवमे) में प्रभाषे या व्यावहारि उद्धार पयेोषभनु स्व३५ छे (से किं तं सुदु मे उद्धारपलिओन मे १) डे ल त ! તે સૂક્ષ્મ ઉદ્ધાર પલ્યાપમ શું છે? उत्तर- (सुडुमे उद्धारपछि ओवमे ) ते सूक्ष्म उद्धार पथाप या प्रभा 9. - ( से जहानामए पल्ले सिया जोयण आयाम विक्खंभेण जोयण उव्वेहेणं विगुणं सविसेसं परिक्खे वे णं) नेम डोई से पहय होय भने ते साधमां, પહેાળાઇમાં તેમજ ઊંડાઈમાં એક ચેાજન પ્રમાણુ હાય, એની પરિધિ કઈક वधारे त्रांशु योजन नेटवी होय. (से णं पल्ले एगाहिय बेयाहिय तेयाहिय जान खत्तरतरूदाण संसट्टे संनिचिए भरिए बालग्गाकोडीण) मा पहयने थे
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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