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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २०४ पल्योपमादीनां औपमिकप्रमाणनिरूपणम् - २६५ निरर्थकान्येतानि ? इत्याह- केवलमेतैः प्रज्ञापना मज्ञाप्यते - प्ररूपणामात्रं क्रियते इत्यर्थः । नतु निरर्थकस्य प्ररूपणा व्यर्था अकिंचित्करत्वादिति चेदाह - बादरे प्ररूपिते सूक्ष्मं सुखावबोधं भवति, अतः सूक्ष्मोपयोगित्वात् - बादरपरूपणा नैकान्वतो निरर्थिका । ननु तर्हि नास्ति किंचित् प्रयोजनमिति यदुक्तं तत् कथं संगच्छते ? इति चेदाह - एतावतः प्रयोजनस्यात्पत्वेना विवक्षणातथोक्तम् अतो " i उत्तर-- 'एएहिं वावहारिय उद्वारपलिओनमसागरोवमेहिं णस्थि किंचिप्पओयणं केवलं पण्णवणा पण्णविज्जइ) इन व्यावहारिक उद्धारपल्पोपम और व्यावहारिक उद्धार सागरोपम से कोई भी ? प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है केवल ये दोनों प्ररूपणा मात्र के लिये हैं । शंका--जब इनसे कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, तो निरर्थक होने से इनकी प्ररूपणा करना ही व्यर्थ है ? उत्तर--ऐसा नहीं है क्योंकि जब बादर पल्योपमादि की प्ररूपणा हो जाती है अर्थात् समझली जाती है, तो उससे सूक्ष्मपत्योपमादि की प्ररूपणा सुखावबोध- सरलता से समझने में आजानेवाली हो जाती है । इसलिये सूक्ष्म की प्ररूपणा में उपयोगी होने के कारण बादर की प्ररूपणा सर्वथा निरर्थक नहीं मानी जा सकती । शंका--तो फिर 'णत्थि किंचिप्पओयणं'' यह जो पाठ कहा गया है सो इस पाठ की संगति कैसे बैठाली जावेगी ? उत्तर -- सूक्ष्म की प्ररूपणा में यह उसका उपयोगीपना रूप प्रयो उत्तर—(एएहि वावद्दारिए उद्धारपलियोवमखागशेवमेहि पत्थि कि 'चिप्पओयणं केवलं पण्णवणा पण्ण विज्जह) या व्यावहारिक उद्धार पहयोपभ भने ન્યાવહારિક ઉદ્ધાર સાગરાપમથી એક પશુ પ્રયેાજન સિદ્ધ થતું. નથી આ મને ફક્ત પ્રરૂપણા માટે જ છે. શકા—જ્યારે એનાથી કાઇ પશુ પ્રયેાજનની સિદ્ધિ થતી નથી, નિરર્થક હાવાથી એની પ્રરૂપણા જ વ્યર્થ છે? त्यारे ઉત્તર-ખરેખર આમ નથી કેમકે જયારે ખાદર પડ્યેાપમાહિની પ્રરૂપણા થઈ જાય છે, ત્યારે તેનાથી સૂક્ષ્મ પત્યેાપાની પ્રરૂપણા સરલતાથી સમજમાં આવી જાય છે. એથી જ સૂક્ષ્મની પ્રકૃપણામાં ઉપયાગી થઈ પડે છે, એટલા માટે ખાદરની પ્રરૂપણા સાવ નિરક ગણાય નહિ. श-तो पछी " यत्थि कि चिप्पओयमं” मा पा अहेवामां भाये। છે, તેા આા પાઠની સંગતિ કેવી રીતે મધ બેસતી ફરી શકાય ? अ० ३४
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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