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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सू २०२ समयस्वरूपनिरूपणम् मितिसमागमेन-द्वयादिसमुदायात्मकतन्तूनां सम्यक्संयोगेन एका पटशाटिका वो पट्टशाटिका वा निष्पना भवति । तस्या उपरितने तन्तावच्छिन्ने अधस्तनस्तन्तुन छिद्यते । अन्यस्मिन् काले चोपरितनस्तन्तुश्छिद्यते अन्यस्मिन् काले चाधस्तनः । तस्मात् शाटिकाया इस्तमात्रस्फोटनकाल: समयो न भवति। एवं वदन्तं प्रज्ञापकंगुरुं नोदका शिव्या पृच्छति-यावता कालेन शाटिकाद्वयमध्ये न्यतरस्याः शार्टि उत्तर-(जो इणहे समढे) यह अर्थ समर्थित नहीं है-अर्थात् वह समय नहीं है। (कम्हा) क्योंकि (जम्हा संखेज्माणं तंतूणं) संख्यात तंतुओं के (समुदयसमिइसमागमेणं) समुदायरूप समिति के सम्यक संयोग से अर्थात् व्यादिसमुदायामक तंतुओं के विशिष्ट संयोग से (एमा पडलोडिया वा पदृसाडिया वा निप्पज्जह) एक सूतकी शाटिका अथवा रेशम की शाटिका बनती है। (उधरिल्लंमि तंतुमिम अच्छिाणे हिडिल्ले तंतु न छिज्जइ ) सो जब तक उसका ऊपर का तंतु नहीं फटेगा, तब तक नीचे का तंतु नहीं फट सकता है। (अण्णमि काले उवरिल्ले तंतू छिज्जइ अण्णम्मि काले हिडिल्ले तंतू छिज्जह) इसलिये यह मानना चाहिये कि ऊपर के तंतु के छिदने का काल दूसरा है और नीचे के तंतु के फटने का काल दुसरा है । (तम्हा से समए न भवइ) इसलिये शाटिका का १ एक हाथ फटने का काल समयरूप नहीं है (एवं वयंतं पण्णवयं चोथए एवं क्यासी) इस प्रकार कहनेवाले गुरु से पुनः प्रश्न कर्ता शिष्य पूछता है कि (जेणं कालेणं तेणं तुण्णागदारएणं तीसे पडसाडियाए वा पट्टसाडियाए वा उवरिल्ले तंतु छिपणे से समए Sत्तर-(णो इणद्वे समी) 0 म समति नथी. मेटले ते अभय -नथी (कम्हा) मई (जम्हा संखेज्जाणं तंतूण) सभ्यत ततुमान (समुदयसमिह समागमेणं) समुहाय ३५ समितिना सभ्य५ सयागथी मेट यालि समुहायात्म तुसाना विशिष्ट साथी (एगे पडसाडिया वा पट्ट साडिया वा निफाइ) से सू१२नी. टि। अथवा रेशमनी शास तयार थाय छ. (वरिल्लंमि तंतुम्मि अच्छिपणे हिडिल्ले तंतु न छिज्जइ) तो न्यां सुधा તેની ઉપરને તંતુ (તાર) ફાટશે નહીં, ત્યાં લગી નીચેનો તંતુ ફાટશે નહીં (अण्णमि काले अविल्ले तंतू छिज्जइ अण्णमि काले हि ढिल्ले तंतू छिज्जइ) એટલા માટે આ વાત માની લેવી જોઈએ કે ઉપરના તને છેદન કાલ मन्य छ भने नीयन तुना हैन मन्य छे. (तम्हा से समए न भवई) એટલા માટે શાટિકાને એક હાથ વસ્ત્ર ફાડવાને કાલ સમય રૂપ નથી. (एवं वयंते पण्णवयं चोयए एवं वयासी) मा प्रभारी नारा १३२ श
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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