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________________ २२८ अनुयोगद्वारसूत्र अथ कालप्रमाणं निरूपयति मूलम्-से किं तं कालप्पमाणे?, कालप्पमाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-पएसनिप्फण्ण य विभागनिष्फण्णे य । से किं तं पएसनिफण्णे ?, पएसनिप्फपणे एगसमयटिइए दुसमयटिइए तिसमयट्रिइए, जाव दससमयट्रिइए असंखिजसमयटिइए से तं पएसनिफण्णे।से किं तं विभागनिप्फण्णे ? विभागनिफण्णेसमयावलिशमुहुत्ता, दिवस अहोरत्तपक्षमासा य । संवच्छर जुगपलिया, सागरओसपिपरियट्टा ॥१॥सू०२०१॥ छाया-अय किं तत् कालपमागम् ? कालपमाणं द्विविध प्रज्ञप्तं, तद्यथाप्रदेशनिष्पन्नं च विभागनिष्पन्नं च । अथ किंवत् प्रदेशनिष्पन्नम् ? प्रदेशनिष्पक्षेत्र प्रमाण की प्ररूपणा की गई जाननी चाहिए, यह सूचित करने के लिये कहते हैं-यह सब क्षेत्र प्रमाण है सूत्र ॥२०॥ अब सूत्रकार कालप्रमाण का निरूपण करते हैं'से कितं कालपपमाणे' इत्यादि। शब्दार्थ-(से किं तं कालप्रमाणे ?) हे भदंत ! कालप्रमाण क्या है? उत्तर-(कालप्रमाणे दुविहे पणत्ते) वह कालप्रमाण दो प्रकार का कहा गया है । (तं जहा) वे दो प्रकार उसके ये हैं (पएसनिफण्णे य विभागनिफण्णे य) एक प्रदेश निष्पन्न काल प्रमाण और दूसरा विभाग निष्पन्न कालप्रमाण । (से कि तं पएप्सनिप्कण्णे) प्रदेश निष्पन्नकाल. प्रमाण का क्या स्वरूप है ? પ્રમાણની પ્રરૂપણ થયેલી જાણવી જોઈએ આ સૂચિત કરવા માટે કહે છેमा से पूर्ण क्षेत्र प्रमाण छ. ॥सू०२००॥ હવે સૂત્રકાર કાલ પ્રમાણનું નિરૂપણ કરે છે– "से किं तं कालप्पमाणे" इत्यादि। हाथ-(से किं तं कालप्रमाणे १) मत! सप्रमाण शु. छे ? उत्तर-(कालप्पमाणे दुविहे पण्णत्ते) त सप्रमाण में प्रारनु उपामा मायु. (तंजहा) ते मे । मा प्रभारी छ. (पएसनिष्फण्णे य विभाग. निकणे य) से प्रदेश नि०पन्न प्रमाण भने पार विमा निनादप्रमाणु (से किं तं पएसनिप्फण्णे ?) महेश निष्पन्न प्रमानुस्१३५ छ?
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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