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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २०० प्रमाणागुलनिरूपणम् २१५ विष्कम्भा भवति । काकिणी रत्नस्य द्वादशाप्यम्रय एकैकोत्सेधाङ्गुलपमाणा भवन्तीति भावः । काकिणीरत्नं हि समचतुस्रं भवति, अतोऽस्यायामो विष्कम्भश्च प्रत्येकमुत्सेधाशुलपमाणो बोध्यः । ऊ कृता सती या कोटिरायामवती भवति सैन तिर्यकृता सती विष्कम्भवती भवति, अत आयामविष्कम्भयोरेकतरनिर्णयेऽप्यपरोऽपि निर्णीत एवेति सूत्रे विष्कम्भ एवोपात्तः तेन आयामोऽपि स्वत एवं बोध्यः । तदेवं काकिणीरत्नमुत्सेधाङ्गुलप्रमाणमुक्तम् । तदैकैककोटिगतमुत्से धाशुलं श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य अर्दाङ्गुलम् । तत् सहस्रगुणं प्रमाके जैसा होता है । अर्थात् यह समचतुरस्र होता है। (तस्स ण एगमेगा कोडी उस्से हंगुलविखंभा) इस काकिणी रत्न को एक कोटी उत्सेधागुल प्रमाण चौडी होनी है। तात्पर्य कहने का यह है कि काकिणी रस्न की जो १२ कोटियां हैं, वे एक उत्सेघोङ्गुल प्रमाण होती है । क्योंकि काकिणीरत्न समचतुरस्त्र होता है, इसलिये इसका आयामलम्बाई, और विष्कंभ-चौडाई, ये प्रत्येक उत्सेधांगुल प्रमाण होते हैं, ऐसा जानना चाहिये। ऊँची करने पर जो कोटि आयामवतीलंबी होती है, वही तिरछी करने पर विष्कंभवती-चौड़ी-हो जाती है। इसलिये आयाम और विष्कंभ इनमें से किसी एक का निर्णय हो जाने पर दूसरा भी निर्णित हो जाता है, इसी ख्याल से मूत्र. कारने सूत्र में विष्कम पद का ही पाठ रखा है। क्योंकि इसी से आयाम का बोध हो जाता है इस प्रकार काकिणीरस्न उत्सेधांगुल प्रमाण होता है, यह बात सूत्रकारने यहां कही है । (तं ममणस्सडाय सटा सा समयतुरख य छे. (तस्स णं एगमेगा कोडी उस्सेहंगुलविक्खंभा) Lilso Reननी ४ मे ट सेधानस प्रभार પહોળી હોય છે તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે કાકિણી રનના જે ૧૨ પૂણાઓ છે તે એક ઉત્સધાંગુલ પ્રમાણ છે. કેમકે કાકિણી રત્ન સમચતુરસ હોય છે, એટલા માટે આને આયામ (લંબાઈ) અને વિષ્ક (પહોળાઈ) દરેક ઉસે. ધાંગુલ પ્રમાણ હોય છે, આમ જાણવું જોઈએ ઊંચી કરવાથી જે કેટિ मायामवती.-ain) डाय छ, ते ail ४२॥थी मिती-पाणी-थ। જાય છે. એટલા માટે આયામ અને વિકૅભ આમાં ગમે તે એકની જાણ થઈ જાય તો તેના પરથી બીજા વિશે પણ જ્ઞાન થઈ જાય છે એટલા માટે જ સૂત્રકારે સૂત્રમાં માત્ર વિષ્કસ પદનું જ કથન કર્યું છે. કેમકે આનાથી જ આયામનું જ્ઞાન થઈ જાય છે. આ પ્રમાણે કાકિણી રત્ન ઉલ્લેધાંગુલ प्रमाण थाय छ, या वात सूत्रधारे महाही .छ. (तं समणस्स भगवओ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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