SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 165
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १५४ अनुयोगद्वारसूत्रे मूलम् -णेरइयाणं भंते! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता? गोयमा ! दुविहा पणत्ता, तं जहा-भवधारगिज्जा य उत्तरदेउ. व्विया य । तत्थ णं जा सा भवधारणिज्जा साणं जहणणेणं अंगुलस्त असंखेजहभागं, उकोसेणं पंच धणुप्सयाई। तत्थ णं जा सा उत्तरवेउव्विया सा जहणणेणं अंगुलस्स संखेज्जइभागं उक्कोसेणं धणुसहस्सं । रयणप्पहाए पुढवीए नेरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता ? गोयमा! दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरवेउबिया य, तस्थ of जा सा भवधारणिज्जा साजहन्नेणं अंगुलस्स असंखिज्जइभागं उक्कोसेणं सत्त धणूई तिणि रयणीओ छच्च अंगुलाई, तत्थ णं जा उत्तरवेउव्विया सा जहण्णेणं अंगुलस्त संखेज्जइभागं उक्कोसेणं उत्सर्पिणी के तीसरे काल या अयसरिणी के चौथे काल जैसा अनु. भाव सदा विद्यमान रहता है । यहां १ कोटि पूर्व की स्थिति होती है। यहां का पुण्यप्रभाव पूर्वोक्त भोगभूमि के क्षेत्रों की अपेक्षा कम होता है । और इसकी अपेक्षा भरत और ऐरक्त क्षेत्र के मनुष्यों का कम होता है। "परमाणू तसरेणू" इत्यादि गाथा में यद्यपि उच्छलक्षण श्लक्षिणका, नाश्लक्षिणका और ऊर्ध्वरेणु ये तीन पद नहीं कहे गए हैं-तौभी ये यहां उपलक्षण से गृहीत किये गये हैं, ऐसा जानना चाहिये ।। मृ० ११५ ॥ અહીં એક કટિ પૂર્વની સ્થિતિ હોય છે અહી ને પુણ્યપ્રભાવ પૂર્વોક્ત ગભૂમિના ક્ષેત્રની અપેક્ષા કમ હોય છે અને આની અપેક્ષાએ ભરત અને १२वत क्षेत्रना मनुष्याना १९५ प्रम: ५८५ :य छे. “परमाणू तसरेणू" વગેર ગાથામાં જો કે ઉઠ્ઠલભણલક્ષિણકા, લ ક્ષિણકા અને ઉર્વરેણુ આ ત્રગ પદ કહેવામાં આવ્યાં નથી છતાં એ અહીં ઉપલક્ષણથી ગૃહીત थयेi छ, म य न ॥ सू० १८५।।
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy