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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १९४ उत्सेधागुलप्रमाणनिरूपणम् उत्तरयति-हन्त । हव्यमागच्छेत् । पुनः पृच्छति-स खलु भदन्त ! तत्र-मनिस्रोतसि विनिघातम् प्रतिस्खलनम् आफ्धेत-माप्नुयात् ? आह-नायमर्थः समर्थः। न खलु तत्र शस्त्रं क्रामति । पुनः पृच्छति-स खलु भदन्त ! उदकावर्त वा उदकविन्द वा अवगाहेत अवगाह्य तिष्ठेत् ? हन्त ! अगाहेत । कि स तत्र कुथ्येत्=पूतिभावमाप्नुयान ? वा अथवा पर्यापधे जलरूपतया परिणमेत् ? आह-नायमर्थः समर्थः। न खलु तत्र शस्त्रं कामति। अनन्तरोक्तमेवार्थ संक्षेपतो गाथया माह उत्तर-(हंता हव्व मागच्छेज्जा) हां प्रवाह के बीच से शीघ्र जा सकता है । (से णं तत्थ विणिघायमावज्जेज्जा ?) तो क्या वह उल्टेप्रतिकूल-प्रवाह में-अर्थात् प्रवाह में प्रतिकूल चलने पर-प्रतिस्खलना को प्राप्त करता होगा ? (णो णटे सम४) नहीं-यहां पर ऐसा अर्थ समर्थित नहीं हुआ है। क्योंकि उसके ऊपर प्रतिस्खलना-रुकावट-रूप शस्त्र अपना प्रभाव नहीं जमा सकता है । ( से णं भंते ! उदगावत्तं वा उदगहिंदु वा ओगाहेज्जा ? हंता ओगाहेज्जा-से गं तस्थ कुच्छेज्जा वा ? परियावज्जेज्जा वा? जो इणटे समढे, णो खलु तत्थ सत्थं काह) हे भदन्त ! वह व्यावहारिक परमाणुपुद्गल क्या. उदकावत-जलभ्रम में अथवा उदक बिन्दु में अवगाहित होकर ठहर सकता है ? हां ठहर सकता है। तो क्या वह वहां पूतिभाव-सडान, को प्राप्त हो जाता है अथवा जलरूप से परिणम जाता है। नहीं यह अर्थ समर्थित नहीं हुआ है-तात्पर्य यह है जलभ्रम में या उदक विन्दु में व्यावहारिक उत्तर-(इंता हवमागच्छेज्जा) i प्रवाहनी मध्यमा यते प्रति अवार्ड त२६ शी तिथी ५सा२ थ श छे. (से णं तत्थ विणिघायमावज्जा ?) તો શું તે પ્રતિકૂલ પ્રવાહ તરફ ગતિ કરવાથી પ્રતિખલના પ્રાપ્ત કરતે હશે ? (णो इणट्रे समढे) नही, मी माव। अर्थ घटित यता नयी भ नी 6५२ प्रतिमन ३५ शखनी अस२ थती नथी (से णं भंते ! उदगावत्तं वा उदबिंदु वा ओगाहेज्जा १ इंता ओगाहेजा-से णं तत्थ कुच्छेज्जा वा ? परियावज्जेज्जा वा? णो इण सम, णो खलु तत्थ सत्थं कमइ) RE ! ते વ્યાવહારિક પરમાણુ પુતલ શું ઉકાવ–જલબ્રમમાં–અથવા તે ઉદકબિંદુમાં અવગાહિત થઈને સ્થિર થઈ શકે છે? હા, સ્થિર થઈ શકે છે. તે શું તે પ્રતિભાવ (સડા)ને પ્રાપ્ત કરે છે. અથવા જલરૂપમાં પરિણનિત થઈ જાય છે? નહીં, આ અર્થ અહીં ઘટિત થતો નથી તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે જલ. ભ્રમમાં કે ઉદકબિંદુમાં વ્યાવહારિક પરમાણુની સ્થિરતા થઈ જાય છે છતાં એ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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