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________________ तत्र श्रावकाद्यभेदोपचारात् स्थापनारूपमावश्यकमित्यर्थः । काष्ठकर्मादिषु आवश्यक क्रेयां कुर्वन्तो यत् स्थापनारूपाः श्रावकादयः स्थाप्यन्ते चित्ररूपेण तत् :स्थापनावश्यकामिति तात्पर्यम् ! तदाह-जण्णं' इत्यादि । यखलु काष्टकर्मणि वा-काले समुत्की रूपके वा पुस्तकर्मणि वा । पुस्तं वस्त्रं तम्य कर्म-तन्निर्मिता पुचलिका बस्मिन् वा। अथवा-पोत्यकर्मणि' इतिच्छाया, पोत्थं पुस्तकं, तच्चेह संपुटकरूपम्, तत्र कर्म तन्मध्ये वर्तिकालिखितं रूपकं तम्मिन् वा । यद्वा-पोत्थं-पुस्तं ताडपत्रं, तत्र कर्म-तच्छेदनिष्पन्नं रूएकं तस्मिन् वा । चित्रकर्मणि वा-चित्रलिखिते रूपके वा लेप्यकर्मणि-लेप्यरूपके वा, ग्रन्थिमे वा-ग्रन्थेन निवृत्तं ग्रन्थिमं-नैपुण्यातिशयात् ग्रन्थिसमुदाय निष्पादितं रूपकं तस्मिन् वा । वेष्टिमे वा-वेष्टनेन-पुष्पवेप्टनक्रमेण निष्पन्नं रूपकं वेष्टिमं उसका चित्र जो कि ज्ञानादि गुणों से सर्वथा शून्य (रहित) होता है. वह स्थापना. निक्षेप है उसमें आवश्यक क्रिया को संपादन करने की आकृतिरूप में श्रावक आदि को का फोटो-पत्थर या काष्ठ के पटिये पर बनाया जाता हैं, सो चित्र यही स्थापनारूप आवश्यक है। इसी विषय को सूत्रकार "जणं" इत्यादि पदों द्वारा स्पष्ट करते हैं-(जण्णं कठकम्मे वा पोत्थकम्मे वा) जो आकृति काष्ठ में उकेरी जावे उसमें अथवा पुस्त-वस्त्र-कपडे पर चित्रित की जावे उसमें अथवा वस्त्र से पुत्तलिका के रूप में बनाई जावे उस में या पोत्यकर्मणि" पुस्तक के बीच में कुची से रंग आदि भर कर बनाई जावे उसमें अथवा ताड पत्र पर छेद करके बनाई जावे उसमें अथबा (चित्तकम्मे वा) चित्ररूप में बनाई जावे इसमें (लेप्पकम्मे वा) अथवा मृत्तिका को गिली करके बनाई जावे उसमें (गंथिमे वा वेढिमे वा पूरिमे वा संचाइमे वा) अथवा वस्त्र की गांठों के समुदाय से કોતરવામાં આવેલું તેનું ચિત્ર કે જે જ્ઞાનાદિ ગુણોથી સર્વથા વિહીન હોય છે, તે સ્થાપનાનિક્ષેપ છે. જેમાં આવશ્યક ક્રિયાને સંપાદન કરષાની આકૃતિરૂપે શ્રાવક આદિકનાં ચિત્રો પથ્થર પર અથવા લાકડાનાં પાટિયાં વગેરે પર બનાવવામાં આવે छ, तर ४ स्थापना ३५ आवश्य: छ. मे विषयने सा२ "जण्णं" त्यात પદ દ્વારા સ્પષ્ટ કરે છે– (जण्णं कट्टकम्मे वा पोत्थकम्मे 1) रे माति et ५२ तरी ४८वामा આવે તેમાં અથવા પુસ્ત પર (વસ્ત્ર પર) ચિત્રિત કરવામાં આવે તેમાં, અથવા વસ્ત્ર भांथी दी३चे मनापामां आवे तमा अथवा-पोत्यकर्मणि" पुस्तनी मह२ पछी १ २ पूरीने मनापामा मावे तभी, अथवा (चित्तकम्मे वा) यत्र३२ २४ सन ४२वामां आवे तमां, (लेप्पकम्गे ना) ली- भाटीमाथी मनापामा भाव तेभां, (गंथिमे वा, वेढिमे वा, पुरिमे वा, संधाइमे वा) मयाsal anistra साक्षी
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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