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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १६४ सप्तस्वरलक्षणनिरूपणम् भवन्ति पृथिवीपतयः । शूराः संग्रहकर्तारः, अनेकगणनायकाः ॥५॥ धैवतस्वरसम्पन्ना भवन्ति कलहपियाः । शाकुनिका वागुरिकाः सौकरिका मत्स्यबन्धाश्च ॥६॥ चाण्डालामौष्टिकाः सेया ये अन्ये पापकर्माणः । गोघातकाश्च ये चोरा निषादं स्वरमाश्रिताः ॥ ७॥ सू० १६४ ॥ भी इसी प्रकार से खिलाते पिलाते रहते हैं । (पंचमस्सरसंपन्ना हवंति पुढवीवई) जो पंचमस्वर से युक्त होते हैं वे पृथिवीपति होते हैं। (सूरा संगहकत्तारो अणेगगणनायगा) शूरवीर होते हैं, संग्रह करनेवाले होते हैं और अनेक गणों के नायक होते हैं। तथा जा (धेवयस्सरसंपन्ना हवंति कलहप्पिया) जो धैवतस्वरवाले होते हैं वे कलहप्रिय होते हैं-लड़ाई झगडा करना उन्हें बहुत पसन्द आता है। (साउणियावग्गुरिया सोयरिया, मच्छयंधा य) शाकुनिक-पक्षियों का शिकार करनेवाले, होते हैं, वागुरिक-हरिणों की हत्या करनेवाले होते हैं, सौकरिक-सुअरों का शिकार करनेवाले, होते हैं, और मत्स्यबंधमछलियों को मारनेवाले, होते हैं ! (चंडाला) तथा जो चांडाल-रौद्रकर्मा हैं (मुट्ठिया) मुष्टि से प्रहार करनेवाले हैं (सेया) अधम जातीय हैं-(जे अन्ने पावकस्मिणो) तथा इनसे भिन्न जो पाप कर्मों में परायण बने हुए प्राणी हैं, तथा जो (गोघातगा) गोघात करनेवाले हैं (जे चोरा) जो चोरी करनेवाले हैं (णिसायं सरमस्सिया)वे सय निषाद स्वर से आश्रित મુજમ તૃપ્તિદાયક સુસ્વાદુ ભોજન મેળવે છે. દૂધ વગેરે પીવે છે. બીજાઓને ५ मेवी शत माता पी.पता २ छे. (पंचमस्सरसंपन्ना हवंति पुढवीवई) २॥ ५यम २१२ सपन्न य छ त पृथ्वीपति डाय: छे. (सूरा संगहकत्तारो अणेगगणनायगा) शूरवी२ सय छ, सह ४२ना२ डाय छ भने । गाना नेता डाय छे (धेवयस्सरसंपन्ना) तेभ रे धैवत २१२. पापाय छे. (हवंति कलहप्रिया) ते ४ प्रिय हाय छ , स, त:२१२ तेभने म गमे छे. (साउणिया वग्गुरिया सोयरिया, मन्बंधा य) - નિક-પક્ષીઓને શિકાર કરનાર હોય છે વારિક-હરણની હત્યા કરનારા હોય છે સૌકરિકસૂવરનો શિકાર કરે છે અને મત્સ્ય બંધ-માછલીઓને भारना२ डाय छे. (चंडाला) तम यांस-शा -छ, (मुद्रिया) भुष्टिपार ४२ना२। डाय छे. (सेया) अधम त डाय छ (जे अन्ने पावकम्मिणो) तमन मेमनाथी मिन्न २ ५।५ मा २१ २२ छ तया २ (गोघातगा) गो१५ ४२ना२ डाय छे (जे चोरा) २॥ योरी ४२ना। 2. (णिखाय 'सर अ० १०१
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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