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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १५६ पारिणामिकभावनिरूपणम् ६४३ , हिमवदादयः पर्वताः । ग्रामादयः प्रसिद्धाः । पातालाः = पातालकळशाः । शेषा भवनाद्यनन्तमदेशिकान्ताः प्रसिद्धा एव । ननु वर्षधरादयः शाश्वताः, न ते कदाचिदपि स्वकीयं भावं मुञ्चन्ति तत्कथं पुनरेषां सादिपारिणामिकत्वमुक्तम् ? इति - चेदाह - वर्षभरादीनां शाश्वतत्वं तदाकारमात्रेणैवावतिष्ठमानत्वाद् बोध्यम् । पुद्गलाआदि क्षेत्र (वासरा) हिमवत् आदि पर्वत (गामा, नगरा, घरा, पव्वया, पायाला) ग्राम, नगर, घर, पर्वत, पातालकलश (भवणा) भवन (निरया) नरक, (रयणप्पा) रत्नप्रभा (सकर पहा) शर्करा प्रभा (वालुयपहा) बालु का प्रभा (पंकप्पा) पंक प्रभा (धूमप्पहा ) धूमप्रभा (तमप्यहा) तमः प्रभा (तम तमप्पहा) तमस्तमः प्रभा (सोहम्मे ) सौधर्म (जाव अच्चुए) यावत् अच्युत (गेवेज्जे अणुत्तरे) ग्रैवेयक, अनुत्तर, (इसिप्पन्भारा ) ईषत्प्राभारा (परमाणुपोग्गले) परमाणुपुद्गल (दुपए सिए) द्विप्रदेशिक (जाव अनंत एसिए) यावत् अनंतप्रदेशिक (से तं साइपारिणामिए) इस प्रकार वह यह सादि पारिणामिक है । शंका- वर्षधरादिक तो शाश्वत हैं। क्योंकि ये कभी भी अपने अस्तित्व का परित्याग नहीं करते हैं। फिर इन्हें सादि परिणामवाला कैसे सूत्रकारने कहा है ? उत्तर - वर्षधरादिकों में जो शाश्वतपना कहा है वह " वे अपने आकार मात्र से ही सदा अवस्थित रहते हैं " इसी ख्याल से कहा गया रेमाविशेष), (वासा) भरत आहि क्षेत्र ( वासधरा) हिमवान् याहि पर्वत, (गामा, जगरा, घरा, पव्वया पायाला ) ग्राम, नगर, घर, पर्वत, पाताजासश, (भवणा) भवन, (निरया) न२४, ( रयणप्पभा) २त्नयला, (सकरप्पभा) शरायला, (वालुयपभा) वालुठायला, (पंकप्पाहा) पशुप्रभा (धूमप्पहा ) धूभअभा, (तमप्पा ) तभःप्रभा, ( तमतमप्पा ) तभस्तभ ः प्रभा ( सोहम्मे जाब अच्चुए) सौध - भथी सहने अभ्युत पर्यन्तना उयेो, (गेवेज्जे अणुत्तरे) ग्रैवेय है। अनुत्तर विभाना, (इचिप्पब्भारा) पत्प्राग्भारा, (परमाणु पोग्गले) परमाणु युद्धस (दुपएलिए जाव अनंत पविए) द्विप्रहेशिम्थी सहने मनतप्रदेशि पर्यन्तना सुधा, (सेतं साइ पारिणामिए) या मघाने साहियारिष्यामि भाव ३५ समभवा. શકા-વધર આદિ પવતા તા શાશ્વત છે, કારણ કે તેઓ કદી પણ પાતપેાતાના અસ્તિત્વને પરિત્યાગ કરતા નથી છતાં સૂત્રકારે તેમને સાઢિ પારિણામિક શા કારણે કહ્યા છે ? ઉત્તર-વષધર આફ્રિકામાં જે શાશ્વતતા પ્રકટ કરવામાં આવી છે તેનુ કારણ એ છે કે તેઓ તેમના આકાર માત્રની અપેક્ષાએ જ સદા અવસ્થિત
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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