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________________ नंदुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १५६ पारिणामिकभावनिरूपणम् टीका- ‘से किं त' इत्यादि अथ कोऽसौ पारिणामिकः १ इति शिष्यपश्नः । उत्तरयति-पारिणामिकापरिणमनं सर्वथाऽपरित्यक्तपूर्वावस्थस्य यद्रूपान्तरेण भवनं स परिणामः, उक्तंच "परिणामो ह्यन्तिरगमनं न च सर्वथा व्यवस्थानम् । न च सर्वथा विनाशः, परिणामस्तद्विदामिष्टः॥ इति । स एव तेन वा निवृत्तः परिणामिकः। स सादि पारिणामिकानादि पारिणामिकेति भेदस्यविशिष्टः। तत्र सादिपारिणामिकः अनेकविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-जीर्णमुरा, जीर्णगुडो, अब सूत्रकार पारिणामिक भाव का निरूपण करते हैं"से किं तं पारिणामिए ?" इत्यादि । शब्दार्थः- (से किं तं पारिमाणामिए) हे भदन्त ! पारिणामिक भाष क्या है? उत्तर-(पारिणामिए, दुविहे पण्णत्ते) पारिणामिक भाव दो प्रकार का-कहा गया है । (तं जहा) वे प्रकार ये हैं-(साइपारिणमिए य अणाइ पारिणामिए य सादि पारिणामिक और अनादि पारिणामिक । जिसमें द्रव्य की पूर्वअवस्था का तो सर्वथा परित्याग हो नहीं और एक अवस्था से दूसरी अवस्थाएँ होती रहें इसीका नाम परिणमन-परिणाम है। कहा भी है-"परिणामो" इत्यादि यही बात अन्यत्र कही है, कि एक अवस्था से दूसरी अवस्था का होना यही परिणाम है। अर्थात् स्व. रूप में स्थित रहकर उत्पन्न तथा नष्ट होना परिणाम है,सर्वथा व्यवस्थान હવે સૂત્રકાર પરિણામિક ભાવના સ્વરૂપનું નિરૂપણ કરે છે“से कि तं पारिणामिए" त्या: Avail-(से कि तं पारिणामिए ?) 8 साप! पारिवामि सानु ५१३५ ४वुछ उत्तर-(पारिणामिए दुविहे पण्णत्ते, तंजहा) पारियाभि भावना नीय प्रभारी मेर ४ा छ-(साइ पारिणामिए य अणाइ पारिणामिए य) (१) साल पारि વામિક અને (૨) અનાદિ પરિણામિક જે પરિણામમાં દ્રવ્યની પૂર્વ અવસ્થાને સર્વથા પરિત્યાગ થતું ન હોય એવી રીતે એક અવસ્થામાંથી બીજી અવસ્થાઓ यती २७, सेवा परिमनने साहिरिएम छ । ५९४-"परिणामो" ઈત્યાદિ એજ વાત બીજી જગ્યાએ પણ આ પ્રમાણે જ કહી છે-એક અવસ્થામાંથી બીજી અવસ્થા રૂપ પરિણમન થવું તેનું નામ પરિણામ છે अ० ९३
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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