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________________ भनुयोगद्वारसूत्रे व्याख्याऽपि पूर्ववदेव बोध्या । इत्थं ज्ञानावरणाद्यन्तरायकर्मान्ताष्टप्रकृतीनामेकैकक्षयेण निष्पन्नानि नामान्यभिधाय सम्पति समुदिताष्टकर्म प्रकृतिक्षये यानि नामानि निष्पयन्ते तान्याह-'सिद्धे' इत्यादि-सिद्धा=सिद समस्तमयो जनत्वात् सिदः । बुद्ध बोधस्वरूपत्वाद् बुद्धः। मुक्ताबाह्याभ्यन्तरग्रन्थबन्धन मुक्तत्वाद् मुक्तः। परि. लाभोन्तराय के क्षय होने से क्षीण लाभान्तराय, भोगान्तराय के क्षय होने से क्षीण भोगान्तराय उपभोगान्तराय के नष्ट होने से क्षीण उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय के नष्ट होने से क्षीण वीर्यान्तराय ये नाम निष्पन्न होते हैं (अणंतराए णिरंताए लोणंतराए ) तथा अनन्तराय निरन्तराय और क्षीणान्तराय ये नाम निष्पन्न होते हैं। इस प्रकार ये सब पूर्वोक्त नाम (अंतरायकम्मविप्प मुक्के) अन्तराय कर्म से विमुक्त होने पर होते हैं । ( सिद्धे वुद्धे मुत्ते परिणिन्वुए, अंतगडे, सव्वदुक्खप्पहीणे ) अब सूत्रकार यह कहते हैं कि ये जो ज्ञानावरण आदि से लेकर अन्तराय कर्म पर्यन्त आठकर्म हैं उनमें से एक एक कर्म के नाश होने से जैसे ये भिन्न २ नाम कहे गये हैं उसी प्रकार से आठ कर्मों के सर्वधा नष्ट होने पर जो नाम होते हैं ये हैं-सिद्ध-समस्त प्रयोजन सिद्ध हो जाने से सिद्ध-यह नाम લાભાન્તરાય કર્મને ક્ષય થઈ જવાથી “ ક્ષીણલાભાન્તરય,” ભોગાન્તરાયને ક્ષય થઈ જવાથી “ક્ષીગાન્તરાય,” ઉપભોગાન્તરાયને ક્ષય થઈ જવાથી "क्षीपा -त२.य,” भने वीर्यान्तराय। क्षय पाथी " क्षीवार्या. तशय" । २i नi नामा नि०पन्न याय छे. (अणंतराए, णिरंतराए, जीणंतराए) तथा ना अन्तराय भनी २५ पाथी तना “मनतराय," निरन्तराय' भने 'क्षीयान्तराय' मा नाम नि०५न्न थाय छे. ક્ષીણદાનાનરાયથી લઈને ક્ષીણુન્તરાય પર્યન્તના ઉપર્યુક્ત નામે આત્માને ત્યારે જ ઓળખી શકાય છે કે જ્યારે તેના અનરાય કમને સંપૂર્ણતઃ ક્ષય થઈ ગયો હોય છે. (सिद्धे, बुद्धे, मुत्ते, परिणिवुए, अंतगडे, सव्वदुक्खप्पहीणे) ज्ञाना१२५था લઈને અન્તરાય પર્યન્તના પ્રત્યેક કર્મને નાશ થવાથી જીવના જે ભિન્ન ભિન્ન નામો નિષ્પન્ન થાય છે. તેમનું નિરૂપણ કરીને હવે સૂત્રકાર, આઠે કમેને સર્વથા વિનાશ થવાથી જીવના જે જે નામે નિષ્પન્ન થાય છે, તે નામને પ્રકટ કરે છે આઠે પ્રકારના કર્મોને જ્યારે સર્વથા ક્ષય થઈ જાય છે ત્યારે જીવના समस्त प्रयोगनी सिद्ध 45 nय छ तेथी १नु " सिद्ध" सिद्ध'
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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