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________________ अनुयोगद्वारस्ये रसोऽपि पठ्यते। अयं रसो हि स्तम्भिताहारबन्धविध्वंसादिकर्ता भवति । अयं रसो हि मधुरादिरससंसर्गजवात्तदभिन्तत्वेन विषश्यते । यतो लवणरसयोगादेवान्येऽपिरसाः स्वादीयस्त्वं भजन्ते, अतस्तिक्तादिषु पञ्चसु रसेषु लवणरसस्यान्तर्मावा, अत एव न तस्य पृथगुपादानम् । प्रकृतमुपसंहरबाह-तदेतद्रसनामेति। अथ गुणनाम्नश्चतुर्थभेदं जिज्ञासितुकामः पृच्छति-अथ किं तत् स्पर्शनाम ? इति । उत्तरयतिस्पर्शनाम-स्पृश्यते त्वगिन्द्रियेणावबुध्यते इति स्पर्शः, तस्य नाम स्पर्शनाम । तद्धि अष्टविधम् =अष्टसंख्यक बोध्यम् । अष्ट विधत्वमेवाह-तद्यथा-कर्कश स्पर्शनामएक-एक स्वतंत्र रस कहा गया है। यह रस स्तंभित आहार आदि का विध्वंस का होता है आहार वर्धक एवं मलब. द्धता नाशक होता है। यह रस मधुर आदि रस के संसर्ग से उत्पन्न होने के कारण उनसे-अभिन्न ही माना गया है। क्यों कि लवण रस के भोग से ही अन्य दूसरे रस स्वादिष्ट लगते हैं। इसलिये तिक्तादि पांच रसों में ही लवण रस का अन्तर्भाव हो जाता है । इसलिये इस रस का स्वतंत्र रूप से सूत्रकार ने कथन नहीं किया है। यह अर्थ "से कितं गंधनामे" यहां से लेकर" "महररसणामे" यहां तक के पाठ का किया है । (से तं रसणामे) इस प्रकार यह रस नाम है । (से किं तं फासणामे) हे भदन्त ! गुणनाम का जो चतुर्थ भेद स्पर्श नाम है वह क्या है ? उत्तर--(फासणामे अट्ठविहे पण्णत्ते) स्पर्श नाम आठ प्रकार का प्रज्ञप्त हुआ है। स्पर्शन इन्द्रिय से जो जाना जाता है वह स्पर्श है। રૂપે ગણાવે છે. સિંધાલુણ, નમક, આદિમાં આ રસને સદ્ભાવ હોય છે. આ રસ ઑભિત આહાર આદિને વિધ્વંસ કરવાવાળા હોય છે. આહારવર્ધક અને બંધકેશને નાશક હોય છે. આ રસ મધુર આદિ ૨સના સંસર્ગથી ઉત્પન્ન થતું હોવાને કારણે, તે રસોથી અભિન્ન જ ગણીને અહીં તેને સ્વતંત્ર પ્રકાર રૂપે ગણવામાં આવેલ નથી કારણ કે લવણરસના વેગથી જ અન્ય રસ સ્વાદિષ્ટ લાગે છે. તેથી તિક્તાદિ પાંચે રસોમાં લવણરસનો સમાવેશ થઈ જાય છે. તેથી જ સૂત્રકારે આ રસનું २१तत्र ३३ ४यन यु. नथी " से कि त गंधनामे" या सूत्रधी वन " महुररसणामे" मा सूत्र पय-तना सूत्रानो मापा ५२ ५४८४२वामा माया छे. (से त रमणामे) मा जानु २सनामनु १५३५ समा. प्रश्न-(से किंत फासणामे ?) भगवन् ! गुगुनामना यो ले ३५ જે સ્પર્શનામ છે, તેનું સ્વરૂપ કેવું છે? उत्तर-(फासणामे अदविहे पणत्ते) १५ नाम A8 प्रा२नु प्रशस यु છે. સ્પર્શેન્દ્રિયની મદદથી જે અનુભવ થાય છે, તેનું નામ ૫શ છે
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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