SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 654
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १४५ द्विनामादिस्वरूपनिरूपणम् ६४१ एकाक्षरिकं च अनेकाक्षरिकं च । तत्रैकाक्षरिक्रम् एकं च तदक्षरं चेति एकाक्षरम्, तेन निर्वृत्तमेकाक्षरिकम्, तद्धि - ही: - लज्जा, श्रीः - लक्ष्मीः, धीः- बुद्धि, इत्यादिकमेकाक्षरिकं द्विनाम बोध्यम् । तथा अनेकाक्षरिकम् - अनेकानि च तान्यक्षराणि-अनेकाक्षराणि तैर्निर्टतमनेकाक्षरिकम्, तद्धि-कन्या वीणा लता मालेत्यादिकमनेकाक्षरिकं द्विनाम बोध्यम् । एवं 'बलाका पत्ताका' इत्यादि ज्याद्यक्षरनिष्पन्नमपि उत्तर - (दुनामे दुविहे पण्णत्ते) द्विनाम - द्विविधनाम - दो प्रकार का है। यहां द्विनाम का तात्पर्य दो प्रकार के नाम से है। दो प्रकार का जो नाम है वह द्विनाम है (तं जहा) नाम के दो प्रकार ये है - ( एगक्खरिए य अणेगरिए प) एकाक्षरिक और अनेकाक्षरिक एक अक्षर से जो नाम निष्पन्न हो वह एकाक्षरिक नाम है और जो अनेक अक्षरों से निष्पन्न होता है वह अनेकाक्षरिक नाम है । जैसे 'ही' लज्जा, 'श्री' लक्ष्मी, 'घी' बुद्धि, स्त्री, ये सब एकाक्षरिक द्विनाम हैं। कन्या, वीणा, यता, माला ये सब अनेकाक्षरिक द्विनाम हैं । यही बात ( से किं तं एक्खरिए ? एक्खरिए अणेगविहे पण्ण से) तं जहा ही, सी, घी, थी, से तं एगक्खरिए-से किं तं अणेगक्खरिए ? अणेगक्खरिए-अणेगविहे पण्णत्ते - तं जहा - कण्णा, वीणा, लया, माला, से तं अणगक्खरिए) इस सुत्रपाठ द्वारा प्रश्नोत्तर पूर्वक सूत्रकारने प्रदर्शित की है। इसी प्रकार “बलाका पताका" इन तीन अक्षरों से निष्पन्न हुआ नाम २ - (दुना दुविदे पण्णत्ते) द्विनाभ - द्विविधनाभ मे प्रारनु छे-ही દ્વિનામ પદ એ પ્રકારના અર્થમાં વપરાયું છે. તેથી એ પ્રકારનુ' જે નામ तेनुं नाम द्विनाम छे. (तंजा) नामना से प्रहारो नीचे प्रभाछे- (एक्सरिय अणेगक्खरिए य) (१) अक्षरि भने (२) भनेमाक्ष२ि४ को नाम ठ અક્ષર વડે નિષ્પન્ન થાય છે, તે નામને એકાક્ષરિક નામ કહે છે. અને જે નામ અનેક અક્ષરો વડે નિષ્પન્ન થાય છે, તેને અનેકાક્ષરિક નામ કહે છે. प्रेम हे "ही" (Arm), “श्री” (तक्ष्मी), “ थी" बुद्धि, 'श्री' यहि अक्षरि द्विनाम छे उन्या, वीया, लता, भाषा, आदि अनेमाक्षरि४ દ્વિનામ છે. એજ વાત સૂત્રકારે આ સૂત્રપાઠ દ્વારા પ્રશ્નોત્તરપૂર્વક પ્રક્રેટ કરી છે(से किं त एगखरिए ? एगक्खरिए भणेगविहे पण्णत्ते, तजहा ही, सी, भी थी, से त एगक्खरिए से किं त अणेगक्खरिए ? अणेगक्खरिए अणेगविहे पण्णत्ते - तजहा कण्णा, वीगा, छया, माला, से त अणेगक्खरिए) भा सूत्रपाठा भावार्थ सुपरवाया है. प्रभा " बलाका, अ० ८१ -
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy