SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 570
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १३१ अनुगमस्वरूपनिरूपणम् ५५७ मूलम् - से किं तं अणुगमे ? अणुगमे णवविहे पण्णत्ते, तं जहा - संतपयपरूवणया जाव अप्पाबहुं वेव । णेगमववहाराणं आणुपुच्चीदव्वाई किं अस्थि णत्थि ३? नियमा तिष्णि वि अस्थि । गमववहाराणं आणुपु०बीदव्बाई किं संखिज्जाई असंखिज्जाई अनंताई ३ ? तिष्णि वि नो संखिजाई, असंखिजाई, नो अणंताई ॥ सू० १३१ ॥ छाया - अथ कोऽसावनुगमः ? अनुगमो नवविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-सत्पदमरूपणता यात्रदल्पबहुत्वं चैव । नैगमव्यवहारयोरानुपूर्वी द्रव्याणि किं सन्ति न अपने २ स्थान रूप जाति में हीं अन्तर्भूत होते हैं इस सूत्र की व्याख्या के लिये देखो पीछे का ८० वां सूत्र || || मू० १३०॥ 66 से किं तं अणुगमे " इत्यादि । शब्दार्थ - (से किं तं अणुग मे ?) हे भदंत ! अनुगम का क्या स्वरूप है ? उत्तर - ( अणुगमे णवविहे पण्णत्ते) अनुगम नौ प्रकार का कहा गया है । (तंजा) जैसे (संतपय परूवणया, जाव अप्पाबहुं चेव) संतपद - प्ररूपणता से लेकर अल्पबहुत्व तक - अर्थात् - ( १ ) सत्पदप्ररूपणता, (२) द्रव्यप्रमाण, (३) क्षेत्र (४) स्पर्शना (५) काल ( ६ ) अन्तर, (७) भाग (८) भाव (९) अल्पबहुत्व । विद्यमान पदार्थ विषयक पद की प्ररूपणा का नाम सत्पदप्ररूपणता है। इस में (गमहाराणं आणुपुत्रीदव्बाई किं अस्थि णत्थि ३) जो સ્થાન રૂપ જાતિમાં જ અન્તભૂત થાય છે. આ સૂત્રની વ્યાખ્યા માટે પાછળ ૮૦મું સૂત્ર વાંચી જવુ... જોઈએ।।સૂ॰૧૩૦ના 66 ' से किं तं अणुगमे " इत्याहि शब्दार्थ - (से किं तं अणुग मे १) हे भगवन् ! अनुगमनुं स्व३५ ठेवु' है? उत्तर- (अणुग विहे पण्णत्ते) अनुगंभ नव प्रहारनो ह्यो छे. (सजहा) ते अा नीथे प्रभाछे (संतपयपरूवणया, जाव अप्पा बहु चेष ) सतयह प्र३यताथी सहने અલ્પબહુવ પન્તના નવ પ્રકાર। અહીં ગ્રહણ કરવા જોઇએ. તે નવ પ્રકાર હવે ગણાવવામાં આવે છે— (१) सत्य अ३पटुता, (२) द्रव्यप्रभाशु, (3) क्षेत्र, (४) स्पर्शना, (4) हाज, (६) अन्तर, (७) लाग' (८) लाव मने (८) मध्यमडुत्व. વિદ્યમાન પદ્મા વિષયક પદ્મની પ્રરૂપણુતાનું નામ સપદપ્રરૂપણુતા છે. तेभां (गमववहाराणं आणुपुत्रीव्वाईं किं अस्थि णत्थि ?) अर्ध सेवा अभ
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy