SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 549
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५३६ अनुयोगशारखे विमानान्युच्यन्ते । ईषत्वामाग-भाराकान्त पुरुषवदीपन्नतत्वात एषा ईषत्माग्भारेस्युच्यते । इयं सौधर्मादोषत्प्राग्भारान्ता पूर्वानुपूर्वी । तया ईत्पाग्भारा यार सौधर्म इति पश्चानुपूर्वी । तथा-अनानुपूर्णा तु सौधर्मादिपञ्चदशपदानामन्योऽन्याअनुत्तरविमानस्थ लो की-अपेक्षा और दूसरे विमान-उसर-श्रेष्ट नहीं है-इसलिये वे विधान अनुत्सर विमान कहे गये हैं । भार आक्रान्त पुरुष की तरह कुछ झुकी हुई होने-से यह ईषत्प्रारभारा इस नाम से कही गई है। सौधर्म से लेकर ईषत् प्रारभारा भूमितक पूर्वानुपूर्वी है। (से किं तं पच्छाणुपूव्वी) हे भदन्त पश्चानुपूर्वी क्या है ? उत्तर-(पच्छाणुपुच्ची) पश्चानुपूर्ण इस प्रकार हैं-(ईसिफभाराजाब सोहम्मे) इषत् प्रारभारा भूमि से लेकर जो सौधर्म देवलोक तक व्यु: स्क्रम से गणना है ! (से तं पच्छाणुपुन्वी ) वह पश्चानुपूर्वी है । (से कि तं अणाणुपुथ्वी ?) हे भदन्त ऊर्श्वलोक सबन्धी अमानुपूर्वी क्या है ? उत्तर-(अणाणुपुव्वी) ऊर्ध्वलोक सबन्धी अनानुपूर्वी इस प्रकार से हैं। (एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए पन्नरसगच्छगयाए सेढीए अन्न मन भासो दूरुवृणो) इस अनानुपूर्वी में जो श्रेणी स्था. અનુત્તર વિમાનસ્થ લેકના કરતાં અન્ય કઈ પણ વિમાન શ્રેષ્ઠ નથી તે કારણે તે શ્રેષ્ઠ વિમાનને અનુત્તર વિમાને કહ્યાં છે. જેમ કે ભારને વહન કરતે પુરુષ સહેજ મૂકી જાય છે એજ પ્રમાણે આ ઈષત્પાશ્વારા પૃથ્વી પણ સહેજ મૂકેલી હોવાને કારણે તેનું નામ ઈષ~ામાર પડયું છે. સૌધ. મથી લઈને ઈન્સ્ટાગ્યાર પર્યન્તનાં પનો ક્રમપૂર્વક ઉપન્યાસ કરે તેનું નામ પૂર્વાનુમૂવી છે. प्रश्न-(से कि त पच्छाणुपुव्वी) भगवन् ! ५श्वानुनु १३५ ४१ उत्तर-(पन्छाणुपुव्वी) ५श्वानुनी मानी -(ईसिपम्भारा जाब सोहम्मे) पत्न. मा२। भूमिथी श३ ४१२ सीध८५ पर्यन्तना क्षेत्राना ઊલટા કમમાં જે ઉપન્યાસ કરવામાં આવે છે-ગણતરી કરવામાં આવે છે (से तं पच्छाणुपुव्वी) तेनु नाम पश्चानु छ.. ___ (से कि तं अणाणुपुवी?) Geqats सभी मनानुभूतीनु વરૂપ કેવું છે? ____ सत्तर-(अणाणुपुव्वी) Balats सभी अनानु५ मा प्रानी - (एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियार पन्नरसगच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दरूवूणो) मा मनानुषामा २ ही स्थापित ४२१मा मावे तेमा सोधी
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy