SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 542
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १२२ तिर्यग्लोक क्षेत्रानुपूर्वीनिरूपणम् द्वीपः । तचारुणवरसमुद्रः । ततः कुण्डलद्वीपः । ततश्च कुण्डलसमुद्रः । ततो रुबकद्वीपः । ततश्व रुचकसमुद्रः । तथा असंख्येयानाम् असंख्येयानाम् द्वीपानामन्ते आभरणवखगन्धोत्पलतिलकापलक्षिताः आभरणवस्त्रगन्धोत्पलतिकादि स्वयम्भूरमगान्ताः द्वीपाः, तत्तन्नामानः समुद्राव सन्ति । स्वयम्भूरमणसमुद्रः - शुद्धोदकरसास्वादः । मूले पुष्कराधारभ्य स्वयम्भूरमणान्ताः शब्दा द्वीपसमुद्रोभयवाचका हैं उनके नाम आभरण आदि के ऊपर हैं। जो द्वीप का नाम है वही नाम बेठे हुए समुद्र का है । स्वयंभूरमण समुद्र के जलका स्वाद शुद्धोदक रसास्वाद जैसा है मूल में पुष्कर से लेकर स्वयंभूरमण तक के शब्द द्वीप और समुद्र के वाचक है। तात्पर्य कहनेका यह है। कि रुचकद्वीप और रुचकसमुद्र के आगे आभरण द्वीप और आभरणसमुद्र है । इसके बाद वस्त्र द्वीप और वस्त्र समुद्र है । इसके आगे गंध द्वीप और गंध समुद्र है इसी प्रकार से उत्पल, तिलक पृथिवी निधि, रत्न वर्षधर, हर, नदी, विजय वक्षस्कार, कल्पेन्द्र ( कूरु मंदर आवासा कूडानक्खन्तदरा य देवे नागे जक्खे भूए य सयंभूरमणे य ३) कुरु, मन्दर आवासकूट, नक्षत्र, चन्द्र सूर्य देव, नाग यक्ष भूत, और स्वयंभूरमण इन नाम वाले असंख्यात द्वीप और असंख्यात समुद्र है। जंबूद्वीप नाम का जो द्वीप है, वह जंबूवृक्ष से युक्त है । इसलिये इसका नाम जंबुद्वीपहुआ है। इस जंबूद्रीप को वेष्टित हुए गोल चूड़ी के आकार के आकार जैसा लवणસમુદ્ર આદિ અસખ્યાત દ્વીપસમુદ્રો આવેલા છે. દ્વીપેાનાં જે નામેા છે, એજ નામેા તેમને વી'ટળાયેલા સમુદ્રોના માટે પણ વપરાયાં છે. સ્વયંભૂરમણ સમુદ્રનું પાણી શુદ્રે પાણીના જેવાં સ્વાદવાળુ છે. પુષ્કરથી લઈને સ્વયંભૂરમણ પન્તના શબ્દો દ્વીપા અને સમુદ્રો-ખન્નેનાં વાચક છે એમ સમજવું આ કથનનું તાત્પર્ય એ છે કે રુચકદ્વીપ અને રુચકસમુદ્રથી માગળ જતાં આભરણદ્વીપ અને આભરણુસમુદ્ર આવે છે, ત્યાર બાદ વસ્ત્રદ્વીપ અને વસમુદ્ર આવે છે, ત્યાર બાદ ગંધદ્રીપ અને ગધસમુદ્ર આવે છે, त्यार माह उत्पक्ष, तिस, पृथ्वीनिधि, रत्नवर्षधर, हनही विभयवक्षस्मार, ४८पेन्द्र (कुरुमंदर आवासा कूडान स्वत्तचंदसूग य, देवे नागे जक्खे भूप य सयंभूरमणे य ||३||) रु, भन्४२, भाषासङ्कट, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, हेव, નાગ, યક્ષ, ભૂત અને સ્વયંભૂરમણ આ નામેવાળાં અસખ્યાત દ્વીપા અને અસખ્યાત સમુદ્રો આવે છે. જમૂદ્રીપ નામને જે દ્વીપ છે તે જ બૂવૃક્ષથી યુક્ત હાવાને કારણે તેનું નામ જ બૂટ્વીપ છે. આ જ બુદ્વીપને ઘેરીને વલયના अ० ६७
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy