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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र ८० समवतारस्वरूपनिरूपणम् ३३० इति त्रिविधः प्रश्नः। उत्तरमाह-नेगमववहाराणं' इत्यादि । नेगमव्यवहारसम्मतानि आनुपूर्वीद्रव्याणि आनुपूर्वीद्रव्येषु समवतरन्ति, नो अनानुपूर्वीद्रव्येषु, न गा. ऽवक्तव्यकद्रव्येषु । अयं भावः-आनुपूर्वीद्रव्याणि आनुपूर्वी द्रव्यलक्षणायां स्व. जातावेव वर्तन्ते, न ततोऽन्यत्र । यतः समवतारः-सम्यगविरोधेन अवतरणंवर्तनम्-अविरोधवृत्तिता पोच्यते । अविरोधवृत्तिता च स्वजातावेव स्यात् , न त परजातौ । तस्याः परजातित्तित्वे विरोधात् । ततश्च नानादेशवृत्तीनि सर्वायनैगम और व्यवहारमय-संमत जो आनुपूर्वी द्रव्य है वे कहां समाविष्ट होते हैं? क्या आनुपूर्वी द्रव्यों में समाविष्ट होते हैं या अनानुपूर्वी द्रव्यों में ? या ( अवत्तव्यदधेहि समोयरंति) प्रवक्तव्यक द्रव्यों में समाविष्ट होते हैं ? (नेगम ववहारणं आणुपुवी दव्वाई अणाणुपुग्यो दव्वेहिं समोयरंति ) उत्तर- नैगम व्यवहारनय संमत जो आनुपूर्वी द्रव्य हैं वे आनुः पूर्वी द्रव्यों में ही समाविष्ट होते हैं ( नो अणाणुपुच्चीदवेहिं समोय. रंति नो अवत्तव्वयदव्वेहि समोयरंति) अनानुपूर्वी द्रव्यों में समाविष्ट नहीं है और न अवक्तव्यक द्रव्यों में समाविष्ट होते हैं। इसका भाष यह है-कि समस्त आनुपूर्वी द्रव्य, विना किसी विरोध के अपनी जाति में ही रहते हैं दूसरी जाति में नहीं । विना विरोध के अपनी जाति में रहना इलो का नाम समवतार समावेश, अविरोधवृत्तिता है। यह दव्वेहिं समोयरंति, अणाणुपुव्वी व्वेहिं समोयरंति) नैसम भने यहार નયસંમત જે આનુપૂવ દ્રવ્ય છે તેમને કયાં સમાવેશ થાય છે? શું આનુપૂર્વી દ્રમાં સમાવેશ થાય છે, કે અનાનુપૂર્વી દ્રવ્યોમાં સમાવેશ याय छ १ ५24 (अवत्तव्वयवेहिं समोयरंति ) अपतय: द्र०योमा सभा. वेश थाय छ १ (नेगमयवहागण आणुपुत्वीदव्वाई आणुपुब्बीदव्येहि समोयरंति) उत्तर-नाम भने ०५१७२ नयभत २ भानु द्रव्ये, तेमनी मानुषी द्रव्यमान समावेश थाय , ( नो अणाणुपुची दम्बेति समोयरंति, नो अवत्तव्ययवेहिं समोयरंति ) मनानुषी द्रव्योमा समावेश પણ થતું નથી અને અવકતવ્ય દ્રવ્યોમાં પણ સમાવેશ થતો નથી આ કથનનું તાત્પર્ય નીચે પ્રમાણે છે– સમસ્ત આનુપૂર્વી દ્રવ્ય કોઈ પણ જાતના વિરોષ (અવરોધ) બ્રિા પિતાની જાતિમાં રહે છે–બીજી જાતિમાં રહેતા નથી કેઈ પણ પ્રકારના વિરોધ વિના પિતાની જાતિમાં રહેવું તેનું જ નામ સમવતાર અથવા સમા म० ४३
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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