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________________ २८८ अनुयोगद्वार से कि तं नो आगमओ दवाणुपुवी ? नो आगमओ दवाणुपुत्वी तिविहा पण्णत्ता, तं जहा-जाणयसरीरदव्याणुपुव्वी, भक्यिसरीरदवाणुपुत्वी, जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ता दवाणुपुची। से किं तं जाणयसरीरदवाणुपुवी ? जाण्यसरीरदवाणुपुटवी आणुपुरी पयस्थाहिगारजाणयस्स जं सरीरयं ववगयचुयचावियचत्तदेहं सेसं जहा दवावस्सए जाव से तं जाणयसरीरदधाणुपुवी। से कि त भवियसरीरदब्वानुपूवी ? भवियसरीरदवाणपुथ्वी जे जीवे जोणीजम्मणणिक्खंते मेसं जहा दवावस्सए जाव से त. भवियसरीरदवाणुपूवी। __से किं तं जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ता दवाणुपुत्री ? जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ता दवाणुपुवी दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-ओवणिहिया य अणोवणिहिया य। तत्थ णं जा सा ओवणिहिया सो ठ'पा । तत्थ णं जा सा अणोवणिहिया सा दुविहा पण्णता, त' जहा-नेगमश्वहाराणं, संगहस्स य ॥सू० ७३॥ छाय। -नामस्थापने गते । अथ काऽसौ द्रव्यानुपूर्वी ? द्रव्यानुपूर्वी द्विविधा प्रज्ञमा, तद्यथा-आगमतश्च नोआगमतश्च । अब सूत्रकार नामानुपूर्वी को निरूपण करते हैं"नाम ठवणाओ गयाओ" इत्यादि । ॥सूत्र ७२॥ शब्दार्थ-(नामठणाओ गयाओ) नामानुपूर्वी और स्थापनानुपूर्वी का स्वरूप नामावश्यक और स्थापनावश्यक के जैसा जानना चाहिये। (से किं હવે સરકાર નામાનુપૂર્વ નિરૂપણ કરે છે "नामठवणाओ गयाओ" त्याह शहा---(नामठवणाभो गयाओ) नमानुपूर्वा भने स्थापनानुषी १३५ नाभा१श्य भने स्थापना आवश्यना पूर्वात २१३५ मतुसा२१ समन(से कि त दव्वाणुपुवी ?) 3 wiयन ! द्रव्यानुभूती न २१३५ ३ छ ?
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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