SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 278
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका स्त्र ६७ मिश्रद्रव्योपक्रमनिरूपणम् २६५ दिः अश्वप्रभृत्येऽकान्तो विज्ञेयः । अयं भाष:-स्थानकादर्शकादि भूषितानां कृत माना तेषामश्वायेडकान्तानां यच्छिक्षादि गुणविशेषा रण परिम मविषयः मिश्रद्रव्योपकमः। तेषां रङ्गादिभिविनाशस्तु रस्तुविनाश विषयो मिश्रद्रव्योपक्रम इति । अत्र-अश्वाद । सचेतनत्वात् स्थानकादीनाम् अचेतनत्वात् मिश्र द्रव्यत्व बोध्यम् । एतदुपसंहरन्नाह से त' इत्यादि । स एष मिथका द्रव्योपक्रम इति । ज्ञायकशरीरभव्यशरीरच्यतिरिक्तो द्रव्योपक्रमः म्कलोऽपि निरूपित इति सूचयितुमाह-'से तं' इत्यादि । स एष ज्ञावर शरीभव्यशरीव्यतिरिक्तो द्रव्योपक्रम इति । नोआगमतः सर्वोऽपि द्रव्योपत्रमो निरूपित इति सूचयितुमाह'से तं' इत्यादि। स एष नोआगमतो द्रव्योपक्रम इति। द्रोपत्रमः सर्वो निरूपित इति मुरयितुमाह-'से त इत्यादि । स एप द्रव्योपक्रम इति । मृ०६७॥ ये सब अचित्त द्रव्य है। तथा अश्व वगैरह सचित्त द्रव्य है। इन से जब इन सचित्त पदार्थों को विभूषित किया जाता है-तब ये मिश्र ;व्य कहलाते हैं । इन में जो शिक्षा गुण से विशेषता का आपादन होता है यही मिश्र द्रव्योपक्रम का स्वरूप परिकर्म की अपेक्षा लेकर कहा गयो है। त ब इनका खग आदि विनाशक कारणों से विन श हो जाता है तब वह विनाश को लेकर मिश्र द्रव्योपक्रम का स्वरूप कहा जाता है। यही मिश्रद्रव्योपक्रम है। (से त जाणयसरीरभवियसरीरवरित दव्योवक्कमे) इस प्रकार ज्ञायकशरीर द्रव्योपक्रम और भव्यशरीर द्रव्योपक्रम से व्यतिरिक्त द्रव्योपक्रम का स्वरूप कहा है। (से तनोआगमओ दव्योवरकमे-से त दबोवपक्कमे) नोआगम की अपेक्षा लेकर यह द्रव्योपक्रम का स्वरूप पूर्णरूप से निरूपित બળદ, ઘેટાં આદિ સચિત્ત દ્રવે છે. આ સચિત્ત અધ આદિ જાનવરોને જયારે ઉપર્યુંકત સ્થાસક, પણ આદિ અચિત્ત દ્રવ્ય વડે વાત કરવામાં આવે છે, ત્યારે તેઓ મિથ દ્રવ્ય રૂપ બની જાય છે. એવાં મિશ્ર દ્રવ્ય રૂપ સ્થાસકથી વિભૂષિત અવાદિમાં જે શિક્ષા આદિ ગુણની વિશેષતા કરવાને ઉપકમ થાય છે તેનું નામ જ પરિક વિષયક મિશ્ર દ્વપક છે. અને તેને તલવાર આદિ શસ્ત્રો વડે વિનાશ કરવાને જે ઉપક્રમ થાય છે, તે ઉપકાને વિનાશ વિષયક મિશ્ર દ્રપકમ કહે છે. આ પ્રકારનું મિશ્ર દ્રપક્રમનું સ્વરૂપ છે. (से त जाणयसरीरभवियसरीग्वरित दवायक्कमे) આ પ્રકારે સાયકશરીર દ્રવ્યો પકેમ અને ભવ્ય શરીર દ્રવ્યપક્રમથી વ્યનિરિકત (सि-न) सेवा २०५४मा २५३५नु (न३५ 8 ५३ थय छ. ( से तं नो आगमआ दयोक्कमे से तदथ्योरक्कम) 20 ते नाम द्रव्या५मना
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy