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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका.सू०२९ भावावश्यकपर्यायनिरूपणम् छाया-तस्य खलु इमानि एकाथिकानि नानाघोपाणि नानाव्यञ्जनानि नामधेयानि भवन्ति, तद्यथा-- आवश्यकम् १ अवश्यकरणीयम् २ ध्रुवनिग्रहो ३ विशोधिश्च ४। अभ्ययनवगः ५ न्यायः ६ आराधना ७ मार्गः ८ ॥१॥ श्रमणेन श्रावकेण च अवश्यकर्त्तव्यकं भवति यस्मात् । अन्तेऽहनि शस्य तस्मादावश्यकं नाम ॥२॥ तदेतदावश्यकम् ॥ सू० २९॥ अब सूत्रकार भावावश्यकका पर्यायों को कहते हैं"तस्सणं इमे" इत्यादि ! मूत्र ॥ २९॥ शब्दार्थः-(तस्स णं) उस आवश्यक के (इमे) ये वक्ष्यमाण (एगढिया) एक अर्थवाले (नामधेज्जा) नाम हैं। ये नाम (णाणा घोसा णाणा वंजणा) भिन्न २ उदान आदि स्वरों एवं कार आदि अनेक व्यजनोंसे सहित हैं। (तंजहा) वे इस प्रकारसे है-(आवरमयं) १ आव,यक (अवस्स करणिज्जं५) अवश्यकरणीय, (धुवनिग्गहो) ध्रुवनिग्रह ३. (विसाही य) विशोधि ४ अज्झयण छक्वग्गो)अध्ययनषटकवर्ग ५, (नाओ) न्याय ६, (आगहणा) आराधना ७, (मग्गो) मार्ग इनमें आवश्यक शब्दका अर्थ (से किं तं आवस्सयं) इसके पहिले नावेसूत्र में स्पष्ट कर दिया गया है। अवश्यकरणीय-मोक्षार्थीजनों द्वाग यह नियमसे अनुष्टेय (करने योग्य) होता है इसलिये इसका नाम अवश्यकरणीय है। ध्रुव હવે સૂત્રકાર ભાવાવશ્યકના પર્યાયવાચી શબ્દોનું નિરપણ કરે – "तस्सणं इमे" त्याहि (तस्सणं इमे एगट्ठिया नामधेज्जा) ते मापश्यना नीचे प्रमाणे : नामा छ (णाणा घोसा णाणा वंजणा) ते नाभा १६॥ १६हात्त माह २१२। भने ४७।२ मा भने व्यनाथी यु-त छ. (तंजहा) ते नामी नाथे प्रभाछे(आवस्सयं) (१) भा१श्य, (अवस्सकरणिज्ज) (२) मा१२५ ४२७॥य, (धुवनिग्गहा)Qपनि, (बिसाहाय) (४) विधि, (अज्झयणछक्कवग्गो) (५) अध्ययषट् ॥', (नाओ) (६) न्याय, (आराहणा) (७) माराधना भने (मग्गो) भाग (१) 'मावश्य५' मा पहने। अर्थ "से कि तं आवस्सयं" मा प्रश्नसूत्री २३ यता નવમાં સૂત્રમાં પ્રકટ કરવામાં આવ્યું છે. (૨) “અવશ્વકરણીય'-મેક્ષાથી જને દ્વારા ते अवश्य अनुष्ठेय (अनुठान ४२१॥ योग्य, मायणीय) राय छ, तेथी । 'भq. રયકરણીય નામ પડ્યું છે.
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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