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________________ १०४ भनुवार आगमत एक द्रष्यावश्यकम्, पृथक्त्वं नेच्छति । त्रयणां शन्दनयानां ज्ञायक अनुपयुक्तः अवस्तु, कस्मात् ? यदि ज्ञायकोऽनुपयुक्तो न भवति, यदि अनुपयुक्तो ज्ञायको न भवति तस्माद् नास्ति आर.मतो द्रव्यायव म् । तदेतदागमतो द्रःयावर कम् ॥ ०१५॥ टीका-'नेगमस्स णं' इत्यादि जिनशासने हि सर्वमपि सूत्रमर्थश्च नविचार्यते । तत्र न्याः सप्तविधा। नय की दृष्टी से किया जाता है यह सब ए. द्रन्यावश्यक है। क्योकि संग्रहनय भिन्न २ प्रकार की वस्तुओं को तथा अनेक व्यक्तियों को किसी भी सामान्य तत्त्व के आधार पर एक रूप में संकलित करता है। (उज्जु सुयरस एगो अणु उत्तो आगमओ एगं दयावासयं पुहुत्तं नेच्छइ) ऋजु सूत्र नवी दृष्टी में एक अनुपयुक्त आत्मा आगम की अपेक्षा लेकर एक द्रावश्यक है। र ह नय भेदवाद वो नही चाहता है। (तिष्णं सद्दनाणं जाणए अणुवउत्ते अवत्थु, कम्हा ? जइ जाणए अणुवउत्ते न भइ, जइ अणुवउत्ते, जाणए न भवई) तीन शब्दनयों की दृष्टि में जो ज्ञायक होता है वह यदि तों अनुपयुक्त है, तो दह अवन्तुस्वरूप है। क्यों कि ज्ञायक अनुपयुक्त नही होता । यदि वह अनुपयुक्त है तो वह ज्ञायक नहीं है । इसलिये आगम की अपेक्षा लेकर द्रव्यावश्यक जो कहा गया है वह नहीं है। (से तं आगमश्री दवावस्सयं) इस तरह आगम को आश्रित करके प्रक्रान्त द्रव्यावश्यक છે, તથા અનેક અનુપયુકત આત્માઓ અનેક દ્રવ્યાવશ્યક છે. આ પ્રકારનું જે જે કથન ગમ નય અને વ્યવહાર નયની અપેક્ષાએ કરવામાં આવ્યું છે, તેને બદલે અહીં બધાને એક દ્રવ્યાવશ્યક જ કહેવા જોઈએ, કારણ કે સંગ્રહનય જુદા જુદા પ્રકારની વસ્તુઓને તથા અનેક વ્યકિતઓને કેઈ પણ સામાન્ય તત્વને આધાર सन मे ३५मा ससित ४२ छ. (उज्जुसुयस्स एगो अणुव उत्तो आगमओ एगं दध्यावासयं पहुत्तं नेच्छड) ४२, नयनी मे से अनुपयु४त मात्मा मानी अपेक्षा मे द्रव्याश्य छ. २मा नय समापने यात नथी. (तिण्णं सहनयाणं जाणए अणुवउत्ते अवत्थु, कम्हा ? जइ जाणए अणुवउते, न भवइ, जइ अणुवउत्ते, जाणए न भवई) त्रय श०६ नयानी दृष्टि से भानपामा भावे છે કે-જે જ્ઞાયક હોય છે તે જે અનુપયુકત હોય તે તે વસ્તુ સ્વરૂપ છે, કારણ કે જ્ઞાયક અનુપયુક્ત સંભવી શકે જ નહીં જે તે અનુપયુક્ત હોય, તે તે જ્ઞાયક જ હોઈ શકે નહીં. તે કારણે આગમને આશ્રય લઈને જે દ્રવ્યાયશ્યક બતાવવામાં भावे तना सहला ८ नथी. (से तं आगमओ दव्यावरस) । प्ररनु આગમને આશ્રિત કરીને પ્રક્રાન્ત (પ્રસ્તુત વિષયરૂપ) વ્યાવશ્યકનું સ્વરૂપ છે.
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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