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________________ उपयुक्त प्रसंग प्राप्त था और इसके उल्लेख बिना उनका चरितवर्णन अपूर्ण ही दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में प्रभावकचरित्र के कथन को कुछ संभवनीय मानना हो तो माना जा सकता है।(कथाकोषप्रकरण-प्रस्तावना, पृ. 37) (5) परन्तु सुमतिगणिजी और जिनपालोपाध्याय ने इस वर्णन को खूब बढ़ा-चढ़ाकर तथा अपने गुरुओं का बहुत ही गौरवमय भाषा में और चैत्यवसियों का बहत ही क्षुद्र एवं ग्राम्य भाषा में, नाटकीय ढंग से चित्रित किया है- जिसका साहित्यिक दृष्टि से कुछ महत्त्व नहीं है। तब प्रभावक चरितकार ने उस वर्णन को बहुत ही संगत, संयत और परिमित रूप में आलेखित किया है, जो बहुत कुछ साहित्यिक मूल्य रखता है। जिनविजयजी के लेखों का सार इन लेखों के आधार से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि - 1) जिनविजयजी के द्वारा गणधरसार्द्धशतक की बृहवृत्ति, गुर्वावली और प्रभावक चरित्र ये तीन ग्रंथ ही जिनेश्वरसूरिजी के चरित्र के विषय में आधार रूप माने गये हैं। 2) तथा धनपाल कवि और शोभनमुनि की कथा को जिनेश्वरसूरिजी से जोड़ने के कारण सोमतिलकसूरिजी की ‘सम्यक्त्व सप्ततिका' की टीका को प्रमाणित नहीं माना है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि वर्तमान में कवि धनपाल और शोभनमुनिजी के खरतरगच्छीय होने का जो प्रचार किया जा रहा है, वह इतिहास से विरुद्ध है।' 3. वृद्धाचार्य प्रबन्धावली जो 15-16वीं शताब्दी की अज्ञात कर्तृक कृति है, वह असंबद्ध प्रायः है, अतः ऐतिहासिक मूल्य नहीं रखती है। 4. सुमतिगणिजी और जिनपाल उपाध्यायजी द्वारा किया गया वाद का वर्णन अतिशयोक्ति पूर्ण होने से विशेष महत्त्व का नहीं है। ऐसी स्थिति में प्रभावक चरित्र' के वर्णन को मुख्य प्रमाण मानना उचित लगता है। इस प्रासंगिक निरीक्षण के बाद हम अपने मूल विषय पर आते हैं। “जिनेश्वरसूरिजी को खरतर बिरुद मिला था" ऐसा जिनविजयजी निर्दिष्ट पाँच साहित्यिक सामग्री में से केवल वृद्धाचार्य प्रबन्धावली में ही उल्लेख मिलता है। इतिहास के आइने में - नवाङ्गी टीकाकार अभयदेवसूरिजी का गच्छ /034
SR No.036509
Book TitleItihas Ke Aaine Me Navangi Tikakar Abhaydevsuriji Ka Gaccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhushan Shah
PublisherMission Jainatva Jagaran
Publication Year2018
Total Pages177
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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