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________________ प्रशस्ति का श्लोक इस प्रकार है:श्रीमच्चांद्रकुलांबरैकतरणे: श्रीवर्द्धमानप्रभोः, शिष्यः सूरिजिनेश्वरो मतिवचः प्रागल्भ्यवाचस्पतिः। आसीदुर्लभराजसदसि प्रख्यापितागारवद् वेश्मावस्थिति रागमज्ञ सुमुनिव्रातस्य शुद्धात्मनः।।1।। 24.सं. 1294 में पद्मप्रभसूरिजी ने 'मुनिसुव्रत चरित्र' की रचना की। उसकी प्रशस्ति में भी खरतर' बिरुद प्राप्ति की बात नहीं है। देखिये:पूर्वं चन्द्रकुले बभूव विपुले श्रीवर्द्धमान प्रभुः, सूरिर्मङ्गलभाजनं सुमनसां सेव्यः सुवृत्तास्पदम्। शिष्यस्तस्य जिनेश्वर:समजनि स्याद्वादिनामग्रणीः, बन्धुस्तस्य च बुद्धिसागर इति त्रैविद्यपारङ्गमः।।1।। सूरिः श्री जिनचन्द्रोऽभयदेवगुरुर्नवाङ्गवृत्तिकरः। श्री जिनभद्रमुनीन्द्रो जिनेश्वरविभोस्त्रयः शिष्याः।।2।। चक्रे श्रीजिनचन्द्रसूरिगुरुभिधुर्यैः प्रसन्नाभिधस्तेन ग्रंथचतुष्टयीस्फुटमतिः श्रीदेवभद्रप्रभुः। देवानन्दमुनीश्वरोऽभवदतश्चारित्रिणामग्रणीः, संसाराम्बुधिपारगामिजनताकामेषु कामं सखा।।3।। यन्मुखावासवास्तव्या, व्यवस्यति सरस्वती। गन्तुं नान्यत्र स न्याय्यः, श्रीमान्देवप्रभप्रभुः।।4।। मुकुरतुलामङ्कुरयति वस्तुप्रतिबिम्बविशदमतिवृत्तम्। श्रीविबुधप्रभचित्तं न विधत्ते वैपरीत्यं तु।।5।। तत्पदपद्मभ्रमरश्चक्रे पद्मप्रभश्चरितमेतद्। विक्रमतोऽतिक्रान्ते वेदग्रहरवि 1294 मिते समये।।6।। 25.सं. 1328 में लक्ष्मीतिलक उपाध्यायजी ने प्रबोधमूर्ति गणिजी विरचित 'दुर्गपदप्रबोध' ग्रंथ पर वृत्ति लिखी। उसकी प्रशस्ति में 'चान्द्रकुलेऽजनि गुरुजिनवल्लभाख्यो' लिखा है। तथा जिनदत्तसूरिजी से 'विधिपथ' सुखपूर्वक विस्तृत हुआ ऐसा लिखा है। उसमें ‘खरतरगच्छ' की तो कोई बात ही नहीं इतिहास के आइने में - नवाङ्गी टीकाकार अभयदेवसूरिजी का गच्छ /108
SR No.036509
Book TitleItihas Ke Aaine Me Navangi Tikakar Abhaydevsuriji Ka Gaccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhushan Shah
PublisherMission Jainatva Jagaran
Publication Year2018
Total Pages177
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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