________________ "अभी तक माता आदि भी नहीं पायीं / / अब मैं निर्भागी क्या . इतने में चतुरा ने आकर माता तथा राजा ने जो कुछ कहा था उसकी सर्व हकीकत . चन्द्रकला को कह सुनायी। इससे दुःखी / होकर पद्मिनी चन्द्रकला मूछित हो गई। शीत उपचार करने से वह संचेत हुई। प्रियवंदा द्वारा चन्द्रकला के स्वरुप को जानकर तत्क्षण माता वहां आयी। पद्मिनी की ऐसी स्थिति देख कर, उसे अपनी गोदी में .लेकर कहने लगी:- . .. .. ! .. / . / ' 'हे वत्से ! तुझे इतना दुःख क्यों हुआ है ? तू अपने चित्त 'को शान्त कर ' सर्व शुभ ही होगा / हूं तत्व ज्ञान की ज्ञाता और धीर है अत: इस प्रकार दुःख को धारण करना उचित नहीं है / तेरे विवाह के लिए स्वयंवर' रचने की हमारी इच्छा है।" ::. : ., पद्मिनी ने कहा कि "हे माता ! मैं तेरी कुक्षि में उत्पन्न हुई हूं। मैंने मन से जिसे वर लिया उसे छोड़ कर मैं दुसरे किसी भी पुरुष के साथ विवाह नहीं करूंगी। स्वयंवर में अब, क्या सार ? .श्रीचन्द्र ही मेरे पति होंगे / अन्यथा मुझे अग्नि की शरण लेनी पड़ेगी" कन्या का यह निश्चय जान कर चन्द्रवतो ने कहा कि "हे सैनिको !! दीपचन्द्र राजा से कहो कि श्रीचन्द्र की तलाश करावें / " .... - चन्द्रकला की सर्व वार्ता चन्द्र वती ने दीपचन्द्र राजा से कही। राजा तत्क्षण सभा विसजित करके, वीणारव गायक और अमात्य के P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust