________________ * 824 आगे चलते हुए सुन्दर उद्यान को देख कर उसकी छटा को देखने के लिए श्रीचन्द्र ने मित्र सहित उसमें प्रवेश किया / इतने में किये / उन्हें स्वीकार कर उद्यान पालक का सत्कार करके उद्यान को 'देखने के लिए आगे बढे। - पवन से झूमते हुए वृक्ष इस प्रकार दिखाई दे रहे थे मानों कि वे उन्हें हायों से इशारा करके बुला रहे हों / वहां श्रीचन्द्र ने चपक : प्रादि वृक्षों को देखा वहीं उसी के पास एक मनोहर रुपवती कन्या देखी। जिस के हाथों को कमल समझ, गर्दन को महुआ के पुष्प समझ कर नेत्रों में नीलकमल की शंका से, अधर और हाथों को वापोरिया पुष्प समझ कर, केश और वेसी को अपनी ही जाति के जैसे काले वर्ण की स्पृद्धा से भवरे चारों तरफ मंडरा रहे थे। उसे देख कर लज्जा से श्रीचन्द्र मित्र सहित तरक्षण उद्यान से बाहर निकल गये / श्री 'श्रीचन्द्र' के रुप से मोहित होकर, पद्मिनी ने भी विचार किया कि, मेरे पूर्व भव के पति यही प्रतीत होते हैं। कारण कि स्त्री को अपने पति को देखते ही जो चेष्टाएं होनी चाहिये वे सब मेरे अंग में हो रहा हैं। चतुर पद्मिनी ने सखी से कहा कि, "मेरे चित्त को हरने वाला वह पुरुष कौन है ? जो सर्व लक्षणों से युक्त है / रुप और लावण्य का निधि है। क्या नाम है ? इनका पिता कौन होगा 1 क्या कुल होगा? P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust