________________ .. * 750 इच्छा धर्म पर श्रद्धा होना, इन सर्व दुर्लभ वस्तुओं को प्राप्त करके भी धर्म आचरण करना अति दुर्लभ है / अतः हे भव्य प्रात्माप्रो ! प्रमाद आदि का त्याग कर दानादि किया रुपी धर्म कार्य में विशेष अनुरक्त बनो। समकित मूल पांच अनुव्रत, तीन गुण व्रत और चार शिक्षा . व्रत-- ये श्रावक के बारह व्रत हैं / हे वत्स ! धर्म वृक्ष के जड़ समान सम्यक्त्व ग्रहण करो। तुम राजपुत्र हो, इसलिए यथा शक्ति व्रतों को ग्रहण कर सकते हो। तुम्हारे शरीर पर जो शुभ चिन्ह दिखाई देते हैं इससे मुझे महान् राजा होने के लक्षण नजर आ रहे हैं / जो छत्राकार रेखा दिखायी देती है इससे यह प्रतीत होता है कि मातापिता और स्वमस्तक पर अवश्य ही छत्र धारण होगा। लक्षणों से ऐसा प्रतीत होता है परन्तु मुझे विशेष ज्ञान नहीं है / " "समय होने पर सामायिक व्रत को जरुर धारण करना चाहिये और श्री नमस्कार महामंत्र का प्रति दिन स्मरण करना चाहिये समभाव वाला श्रावक दो घड़ी में देव आयुष्य को बांधता है और कर्मो की निर्जरा करता है। त्रस और स्थावर जीवों के प्रति समता भाव आता है इसलिये सामायिक व्रत अवश्य करना चाहिये / एक व्यक्ति नित्य प्रति एक लाख स्वर्ण मोहरों का दान करे और दूसरा एक सामायिक करे तो, वह स्वर्ण का दान करने वाला भी सामायिक करने वाले जितना पुण्य नहीं बांध सकता / श्रावक भाव से स्वर्णगिरि का दान करे तो भी उसके पुण्य में इतना सामर्थ्य नहीं होता जितना कि एक सामायिक करने वाले के पुण्य में होता है।" P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust