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________________ प्रस्थान पद यात्माही जानना चाहिये 5 मोहके क्षयोपशमसे उत्कृष्ट शुज परिणामरूप दर्शनपदई है आत्माही होसकता है 6 ज्ञानावर्णीय कर्मके क्षयोपशमसे यथाऽवस्थित जीवाजीवादि तत्वोंका है। / शुझावबोधरूप ज्ञानपद जी आत्मा ही मानाजासकता है 7 सोलह कषाय, नव नोकषाय रहित शुभ परिणामरूप चारित्र पद आत्मा ही कहा जाता है 8 इच्छानिरोधसे शुद्ध संवरयुक्त, | समभावसे कर्म निर्जरा करने में तत्पर रूप तप पद जी आत्मा ही जानना चाहिये 9 इस प्रकार ये नवपद आत्मा ही है ऐसा समझकर अहो भव्यात्माओं! तुम अपने आत्म-स्वरूपमें सदा लय1 लीन रहो-देशना सुनकर अत्यन्त प्रमुदित हो मगधेश्वर राजा श्रेणिक आदि समस्त परमात्मा 2 महावीर देवको वंदन-नमस्कार अपने 2 स्थानपर चले गये; जगद्गुरु जी सपरिवार अन्यत्र विहार कर गये. . PADAARA.GASTRA WEBISSAGAR ZN Gumratnasuri Ms. Jun Gun Aaradhak Tr
SR No.036490
Book TitleShripal Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagar
PublisherGaneshmal Dadha
Publication Year1924
Total Pages198
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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