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________________ 144 श्रीशान्तिनाथ चरित्र। हुआ और वह सार्थपतिसे विदा मांग कर अपने घर चला गया। इसके बाद धनदत्त भी अपने काफिलेके साथ वहाँसे कूचकर, धीरे-धीरे चलता हुआ समुद्र के पास ही 'गम्भीर' नामके बन्दरगाहमें पहुँचा। वहाँ वह कुछ दिनोंतक रहा भी ; परन्तु इच्छानुसार लाभ नहीं हुआ, इसलिये उसने एक जहाज़ ख़रीदा और उसे तैयार कर, समुद्रको पूज, देशान्तरके योग्य सब तरहके किरानेका सामान उसपर लादकर समुद्रमें ज्वार आनेपर उस जहाज़पर सवार हो गया। इसके बाद अनुकूल वायु पाकर वह जहाज़ बड़े वेगसे चलता हुआ बीच समुद्र में आ पहुँचा / इतनेमें उस सेठ-पुत्रने आकाश-मार्गसे आते हुए एक अच्छेसे तोतेको देखा। उसके मुँहमें आम्र-फल था। उसीको ढोते-ढोते वह इतना हैरान हो गया था, कि समुद्र में गिराही चाहता था। यह देख, सेठने जहाज़के खलासियोंको एक लम्बा चौड़ा कपड़ा फैलाकर उसी पर उस तोतेको ले लेनेका हुक्म दिया। खलासी जब उस तोतेको इसी प्रकार पकड़कर ले -आये, तब उसे हवा-पानीसे स्वस्थकर उसने उसे बुलवानेकी चेष्टा की, तब वह तोता, अपने मुँहका फल नीचे गिरा, मनुष्यकी सी बोलीमें बोला,-“हे सार्थनाथ ! आपने आजतक जितने उपकारके काम किये हैं, उन सबमें मेरा यह जीवन-दान सबसे बढ़कर है। मुझे जिलाकर आपने मेरे बूढ़े और अन्धे मा-बापको भी जिला लिया है। इस महान् उपकारका मैं आपको क्या बदला दूं? अच्छा, तो इस समय मेरा लोया हुआ यह आम्र-फल ही स्वीकार कीजिये / " सार्थवाहने कहा,-"हे शुक-राज ! मैं इस आम्र-फलको लेकर क्या करूँगा ? तुम्ही इसे खा लो और इसके सिवा मैं तुम्हें ईख और अंगूर वगैरह और भी चीजें खानेको देता हूँ, उन्हें भी खा डालो।” यह सुन, तोतेने कहा, "हे सार्थपति ! यह फल बड़ा ही गुणकारी और दुर्लभ है। इस फलका वृत्तान्त मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिये , "इसी.भरतक्षेत्रमें विन्ध्य नामक एक बड़ा भारी पर्वत है। उसीके पास विन्ध्याटवी नामक एक प्रसिद्ध जंगल है। उसी जंगलमें एक P.P.Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036489
Book TitleShantinath Charitra Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhavchandrasuri
PublisherKashinath Jain
Publication Year1924
Total Pages445
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size355 MB
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