SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 58
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रत्येक करकमुरजाषिष्ट / कस्तत्रास्ति महीपतिः // दुधिवाहन इत्येवं / वामवेन प्ररूपितं // 35 // // | अर्थ राज्ञा खहस्तेन / लिखित्वा खमुत्तमं // दुत्वाप्रेषि मिजो पूतो। दधिवाहनसंनिधौ | // 76 // स गत्वा लिखितं दत्वे-त्युदारवचनोऽवदत् // करकंमुर्मम स्वामी / नवंतमिति मा. षते // // दधिवाहनपाल / देहि त्वद्देशमंतरा // मजिरा ग्राममेकस्मै / ब्राह्मणाय यथेप्सितं // 7 // पश्चायो रोचते तुल्यं / ग्रामो वा घुरमेव वा // याचनीयो महीपाल दा. स्याम्यहमपि दाणात् // 5ए // अद्भुतेऽपि चे सामर्थे / न्यायमागों न मुच्यते // इति हेतो. वहारस्ततः कार्य-स्त्वयायं शुजमिछत्ता॥ // इति संदेशकं पूत-मुखेनावीवदद्यदा // करकंमुस्तदा राजा / चुकोप दधिवाहनः // 2 // चुकुटिं चाटयामास / नूपो जालस्थले रुषा | // कोदमचंगप्रोईनै-युफबुध्यैव मार्गणं // 3 // स्फुरदोष्टो बनाणैवं / दधिवाहनभूपतिः // रेरै चामालपुत्रस्य / कः संसर्गों मया सह // 4 // उत्तमानां जन_न-व्र्यवहारो न पूज्य| ते॥ किं काकैः सह संसर्ग / राजहंसाः प्रकुर्वते // 5 // श्रात्मानं स न जानाति / करक P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036472
Book TitlePratyekbuddh Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Dharm Vidya Prasarak Varg
PublisherJain Dharm Vidya Prasarak Varg
Publication Year1920
Total Pages356
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy