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________________ जो 20 हो स मुनिरन्यून-महिमो देवसेवितः // अहो शक्तिधरः साधु-साधुजक्तिपरः सुरः ॥ए॥ अही दुःखकरोदकः / पूज्यपूजाव्यतिक्रमः // अहो अस्य शुनं कर्म।ममात्रागतिकारणं.॥ विनाव्येति कुमारेंड-स्तं विद्याधरमन्यधात् // तीव्रवेग तीनवेगाद् / ब्रज त्वं मा विलंबन // ए६ // बंधोः साम्राज्यसंप्राप्ति / पितुरग्रे निवेदय // इत्यादिष्टः कुमारेण / नत्वा तं सोऽच. सततः // एतस्मिन् विमानमारुह्य / पुरं श्रीरत्नमंदिरं // प्रस्थिते स कुमारेंजो-ऽचालीयदापुरंपति // ए // प्रियध्वजनरेंप्रेण / प्रवेशोत्सवपूर्वकं // नगरांतः समानीतो / विनीतात्मा कुमारराट् // एक // जवांतरस्वरूपं य-धर्मसागरसाधुना // जंक्तमासीत्समस्तं त-कुमारामें नृपो जगौ // 0 // सोऽपि श्रुत्वा जवान् सौवान् / जातजातिस्मृतिः स्वयं // अपश्यच्चंद्रमत्यां चा-बनात्स्नेहमकृत्रिमं // 1 // नृपो लग्ने शुग्ने लग्ने। कुमारेण सुतां निजां // अयोजयत्स्वर्णकारो / रत्नेनेव सुमुडिकां // 2 // स जोगनंगी सुलगः। स्थित्वा तत्र कियचिरं // अमानमानदानेन / सततं पोषितांतरः॥३॥कथंचिच्च शुजमापा-हिमोच्यात्मानमाग्रहात् // कुमारः प्रियया युक्तः / प्रचल्य स्वपुरं ययौ // 4 // युग्मं // तत्र चंद्रमतीं दृष्ट्वा / Mass PP, Ac. Gunratnasuri MS. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036472
Book TitlePratyekbuddh Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Dharm Vidya Prasarak Varg
PublisherJain Dharm Vidya Prasarak Varg
Publication Year1920
Total Pages356
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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