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________________ प्रत्येक पतितामयामास / स च किंचन मूतिः // 4 // चतुनिः कलापकं // दणाट्यावृत्तवैत-11 . न्य रिषेणनरेशितुः // तच्चक्रवाकवच्चक्रं / पाणिपंकजमाश्रयत् // 75 // निःपत्रपद्मवत्पद्मं / निरस्त्रं, विगत श्रियं // विलोक्य जातकारुण्यो। हरिषेणनृपोऽवदत् // 6 // परस्त्रीपरराज्यादि / वास्त्वमपराध्यपि // अधुना मुच्यसे याहि / मुंव जोगान् यथोचितान् // 7 // लोहखममिदं प्राप्य / कि रे गर्व विधास्यसि // मुष्टिघातेन हन्मि त्वां / सचक्रं पद्म इत्यवकु.॥ 7 // हरिषेणो हसन्नाह / तव शिक्षा प्रदीयते // सजीजव नराधीश / भोक्तुमन्यायजं फलं // ए॥ इत्युक्त्वा सोऽमुचच्चकं / ज्वालामालाकरालितं / / पद्मं प्रदक्षिणीकृत्य / जघान नाललीलया // 7 // पपांत पृथिवीपीते / पद्मपार्थिवमस्तकं // हरेरुपरि मुक्ता च / पुष्पवृष्टिः सुरोत्तमैः // 7 // चकुंर्जयजयारावं / प्रहृष्टा हरिसैनिकाः // जयताहासुदेवोऽय-मित्याकाशे गिरोऽजवन् // // एत्याां मे प्रपद्यध्वं / रे रे तिष्टत तिष्टत // अन्यथैकैक शः कृत्वा / हनिष्याम्यखिलानपि // 3 // इत्युक्त्वा वासुदेवेन / नश्यंतो हतनायकाः // षोमशसहस्रभूपाः / प्रणेमुस्तत्पदांबुज // सहायीकृत्य तानेव / हरिषेणनरेश्वरः॥षनिर्मासैः PAPRACaunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036472
Book TitlePratyekbuddh Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Dharm Vidya Prasarak Varg
PublisherJain Dharm Vidya Prasarak Varg
Publication Year1920
Total Pages356
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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