________________ स्पदमासदत् // // तस्य व्यापादनोपाया-न्नृपोऽनेकान् विजावयन् // लब्धबुद्धिः समाहूय / / / / देवदिन्नं जगाविति // ए // अस्माकं धीरवीरेषुः / ननूत्तमतमो जवान् // प्रत्यलः सर्वकार्याचरिणि / कतु कीर्त्या त्वमुज्ज्वलः // 10 // साध्यं विहितं साध्यं / हारमाहरता त्वया // त२२७ था धीराधुना कार्य-मस्माकमपरं कुरु // 11 // स स्मरन्नपि यदोक्तं / दाक्षिण्यांनोधिरन्य धात् // समादिश विशामीशा-देश्याय स्वप्रयोजनं // 12 // लक्ष्मी देवनपोऽवादी-ददीनवचन त्वया // विजेतग्यो ममाराति-महानलमहीपतिः // 13 // तस्यास्ति राजधानीतो / योजनानां शतत्रये // माकंदी नाम नगरी / बलिनानेन पाल्यते // 14 // गृहाण मे समग्रास्त्वं चतुरंगचमूरमूः // शनैरध्वनि गंतव्यं / समेतव्यं विजित्य तं // 15 // तत्स्मरन्नपि यदोक्तं / / देवदिन्नः प्रपन्नषान् // विधातुं प्रार्थनानंगं / विदंत्यपि न सत्तमाः // 16 // प्रणम्य पितरौ दृष्ट्वा / प्रबोध्य च महाग्रहात् // प्राचालीदचलाधीश-दत्तातुलबलस्ततः // 17 // यावद् छि त्रान् पवित्रात्मा / प्रयाणानकरोत्पुरात् // हर्षोत्कर्षधरो राजा / तावदेवं व्यचिंतयत् // 17 // || सिकं साध्यं मदीयं य-निर्गतो नगरादयं // नूनं तत्र गतस्तेन / बलिनैष हनिष्यते // 1 // P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust