________________ जा प्राप्तः श्रीमंदिरं पुरं // 10 // सर्वविद्याधरैस्तत्र / मन्यमानः स तस्थिवान् // साधयामास || सर्वाश्च / विद्या विद्याधरोचिताः // 11 // तत्प्रजावेण सर्वत्रा-स्खलितो विचरत्यसौ // नित्यं 'परिन शाश्वतचैत्यानि / वंदते नाविताशयः // 15 // अन्यदा रत्नसिंडेना-नंदानंदीश्वरंप्रति ॥.प्र. स्थितेन विमानेन / गलता गगनांगणे // 13 // विजये पुष्कलावत्या-मेकस्मिन्नटवीवने // तापसीतापसजनो। रुदन्नुच्चैर्विलोकितः // 14 // करुणापूर्णचित्तेन / तेन तत्रावतीर्य च // पृच्च्यते तापसश्चैकः / किमेवं ना रोदिति // 15 // मुक्तपुत्रकलत्रोऽपि / सांप्रतं तापसो जनः // तेनोक्तं शृणु वृत्तांत-मस्मिन्नेव तपोवने // 16 // अस्माकं त्राणभूतोऽमृद् / गुणगण्याकरोपमः॥ शुक्रबुद्धिः कुलपति-निनिध्यनिधानवान् // 17 // स एव स्वोटजे सुतो / दष्टो दुष्टाहिना निशि // मंत्रतंत्रप्रयोगाश्च / तापसैर्विहिता हितैः // 17 // परं सर्वेऽपि संजाता। निष्फालाश्चंदनपुवत् // अथो मृत इति ज्ञात्वा / दिप्त्वा जंपानकांतरे // 15 // मिलित्वा तापसैः सर्वै-देहसंस्कारहेतवे // नीयते सोऽधुना दुःखा-तापसैरिति रुद्यते // 20 // संसिक मंत्रतंत्रण / रत्नसिंहेन जल्पितं // मम दर्शय तं येन। कुवें कांचित्प्रतिक्रियां // 21 // इत्या P.P.AC.Gunratnasuri M.S. .: Jun Gun Aaradhak Trust