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________________ और चार 177 प्रबंधैन स लब्धमब्धौ / चिंतामणिं हारयति प्रमादात् // 67 // इत्यादिदेशनावाक्य--पीयू. परसर्सिचनैः // रागोरगविषावेगं / स मे किंचिदशीशमत् // 6 // विज्ञप्तः स मया साधो / राज्यं त्यक्त्वाईतव्रतं // त्वदंतिकेऽधुनादास्ये-जविष्यन्नंदनो यदि // ६ए // राज्यमेतनिराधारं / मोक्तुं शक्नोमि नो प्रजो // एकोऽपि च न मे पुत्रो। यो राज्यं धरतेऽग्रतः // // 6 // ततः प्रसीद जगवन् / राज्ययोग्यं नरं वद // तस्मै राज्यं यथा दत्वा ।प्रव्रज्यामह माश्रये // 1 // मुनिनोक्तं महाराज / राज्ययोग्योऽत्र नो नरः // यो जेष्यति रणे त्वां तं / राज्ययोगमवैहि वै // 12 // अद्यापि तव नोक्तव्यं / विद्यते कर्म शर्मकृत् // गृह्णीया गृहमु. त्सृज्य / तस्मिंश्च मिलिते सति // 73 // ततो नागरिकैर्लोकः / सहैवाददि सन्मुनेः // पा सम्यक्त्वमूलानि / बादशाणुव्रतान्यहं // 4 // विजहार महीपीठे। दमसारमुनीश्वरः अहं चास्यां गुणांस्तस्य / स्मरन् कुंदेंदुसुंदरान् // 35 // अनेके मिलिताः शूरा। अहंकारपराः परं // अहं केनापि वीरेण / गुंजितो न कदाचन // 76 // अद्य त्वया जितश्चित्तें / रंजितोऽप्यनवं दृढं // तनो कुमार राज्यं मे। समलंकुरु सांप्रतं // 7 // अहं दीदां गृही. || P.P. Ac! Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036472
Book TitlePratyekbuddh Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Dharm Vidya Prasarak Varg
PublisherJain Dharm Vidya Prasarak Varg
Publication Year1920
Total Pages356
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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