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________________ P.P Ad Gunun MS की भाँति वृद्धिमान हुए। जब पुत्रों की अवस्था पाँच वर्ष की हुई, तो सेठ समुद्रगुप्त ने उन्हें जिन-मन्दिर में ले जा कर विधिपूर्वक देव-गुरु एवं शास्त्र की उनसे पूजा करवायी। तब वे जैन उपाध्याय के यहाँ विद्याभ्यास के || लिए भेज दिये गये / पुण्य के प्रभाव से दोनों ने अल्पकाल में ही विद्याभ्यास पूर्ण कर लिया। वे शास्त्र, पुराण, || 77 सिद्धान्त ग्रन्थ आदि का अध्ययन कर प्रवीण हो गये। जब उनको योग्य युवावस्था हुई, तब माता-पिता ने वैभव-सम्पन्न तथा उत्तम कुल की योग्य कन्याओं से उनके विवाह कर दिये / इस प्रकार धर्म, अर्थ, कामइन तीनों पुरुषार्थों को प्राप्त कर समुद्रगुप्त के दोनों पुत्र अपना समय व्यतीत करने लगे। एक बार अयोध्या के निकटवर्ती उद्यान में महेन्द्रसूरि मुनिराज का आगमन हुआ। वे सर्वथा निर्दोष, मति-श्रुति-अवधि तीनों ज्ञान के धारण करनेवाले थे एवं विभिन्न कलाओं में कुशल थे। उनके साथ अन्य अनेक मुनियों का सङ्घ भी था। मुनिराज के शुभ आगमन के प्रभाव से उद्यान पुष्प एवं फलों से सुशोभित हो गया- उसकी शोभा अपूर्व हो गयी। वृक्षों में षट् ऋतु का आभास होने लगा, मानो मुनिराज के समागम से उत्फुल्ल हो कर वे तत्काल प्रकट हो गये। गाय का बछड़ा एवं व्याघ्र का शावक, बिल्ली एवं हंस के शिशु, मृग एवं सिंह के शावक, मोर एवं सर्प के शिशु अपना-अपना बैर-भाव विस्मृत कर क्रीड़ा करने लगे। तत्पश्चात् उपवन का रक्षक माली आया। उसे वृक्षों को ऋतु का उलङ्घन कर फूलते-फलते देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि ऋतु का यह अस्वाभाविक परिवर्तन अवश्य ही अशुभ-सूचक है। इसकी गवेषणा के लिए वह उपवन में चतुर्दिक भ्रमण करने लगा। जब उसकी दृष्टि मुनिराज पर पड़ी, तो उसके आनन्द का पारावार न रहा। तब उसे निश्चय हो गया कि यह इन परम तपस्वी सन्त का ही अतुलनीय प्रताप है, जिससे उद्यान को अपूर्व शोभा हो गयी है। ___ तब मुनिराज के आगमन का शुभ सम्वाद देने के लिए वह माली सभी ऋतुओं के फल-पुष्प ले कर राजा अरिअय के महल को ओर बढ़ा। राजमहल में जा कर उसने दूर से ही राजा को नमस्कार किया। फिर द्वारपाल की आज्ञा से उसने फल-पुष्पादि महाराज की सेवा में भेंट किये। उसने नम्रतापूर्वक कहा-'हे राजन् ! मत्त कोयलों की ध्वनि से गुजित आप के उद्यान में एक परम तपस्वी मुनिराज का शुभागमन हुषा है। उनके आगमन से वृक्षों में अद्भुत परिवर्तन आ गया है। ऋतु के विपरीत समग्र वृक्ष पुष्पित हो गये हैं। ऐसे || Jun Gun A T
SR No.036468
Book TitlePradyumna Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSomkirti Acharya
PublisherJain Sahitya Sadan
Publication Year2000
Total Pages200
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size275 MB
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