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________________ 200 बैठी। वह भी अङ्गों के संकोच, किंकण शब्द, मनोहर हाव-भाव, विलास-विभ्रम, गोत-नृत्य इत्यादि से राजा मधु को प्रसन्न करने लगी। दोनों ओर से विविध प्रकारेण हास-परिहास होने लगे। कुछ काल तक यही क्रम जारी रहा। उसके पश्चात् राजा मधु ने चन्द्रप्रभा को अपने महल में रख लिया एवं उससे अपनी वासना || की पूर्ति कर अपना जीवन सार्थक समझने लगा। उसने भाँति-भांति के सुगन्धित द्रव्यों से जल की कई एक वापिकायें भरवायीं। उनमें चन्द्रप्रभा के साथ मनोवांछित क्रीड़ा करने लगा। इस प्रकार अनेक उपवन, नदो, पर्वत आदि में विहार करते हए उसने कितना समय व्यतीत किया. इसका उसे भान भी नहीं रहा। इसके पश्चात् चन्द्रप्रभा पर आसक्त होने के कारण उसने उसे अपनी पटरानी भी बना लिया। - उधर राजा हेमरथ की जो दुर्दशा हुई, उस पर भी ध्यान दें। जो वृद्ध सेवक रानी चन्द्रप्रभा की देखरेख के लिए अयोध्या में छोड़े गये थे, उन्होंने जब यह देखा कि चन्द्रप्रभा राजा मधु की पटरानी बन गयी है, तो वे निराश होकर वटपुर लौट गये। उन्होंने राजा हेमरथ को सारा वृत्तांत कह सुनाया। अपनी प्राणप्यारी के वियोग में उसका हृदय छलनी हो गया। उसे कुछ क्षण के लिए तो मूच्र्छा ही आ गयी, वह अचेत होकर गिर | पड़ा। किन्तु चतुर सेवकों ने तत्काल शीतलोपचार भारम्भ किया, जिससे उसकी मूर्छा दूर हो गयो। सचेत | होते ही उसके नेत्र रक्तवर्ण हो गये। उसने मन्त्रियों को आज्ञा दी-'यथाशीघ्र सेना का संगठन करो। मैं अभी अयोध्या पर विजय हेतु प्रस्थान करूँगा एवं राजा मधु को परास्त कर अपनी प्राण-प्यारी को ले माऊँगा।' नीतिज्ञ मन्त्रियों ने परामर्श दिया- 'हे महाराज ! आप का आक्रमण करना कदापि उचित नहीं होगा। महाराज मधु महाबली है / उसे परास्त करना सरल कार्य नहीं है।' मन्त्रियों से ऐसा परामर्श पाकर राजा हेमरथ ने विचार किया कि वस्तुतः राजा मधु को संग्राम में परास्त करना दुष्कर है। फलतः वह निरुद्यमी हो गया। खेद से खिन्न होकर सेज पर पड़ रहा। उसकी दशा विचित्र हो गयी-कभी वह निरुद्देश्य हँसने लगता, तो कभी गाने अथवा रोने लगता था। कभी-कभी सम्पूर्ण दिवस पर्यंत वह गवाक्षों से अवलोकन में व्यतीत कर देता था। चन्द्रप्रभा के अभाव में महल सूना देख कर वह उच्च-स्वर में रुदन करने लगता'हा प्रिये. प्राणवल्लभे। तमे अपहरण कराने का कारण मैं हो हैं। किन्त अब मैं क्या करूँ? किससे कहूँ।' इस प्रकार नाना प्रकारेण सङ्कल्पों-विकल्पों से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयो / वह विचारहीन एवं उन्मत्त होकर Jun cun Aaradhak 100
SR No.036468
Book TitlePradyumna Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSomkirti Acharya
PublisherJain Sahitya Sadan
Publication Year2000
Total Pages200
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size275 MB
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