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________________ कि ये राजा मधु के स्वागत में अर्घ प्रदान कर रहे हैं। यह रमणीक उद्यान राजा का क्रीड़ा-स्थल बना। उन्होंने पिचकारियों में केशर मिश्रित जल भर कर क्रीड़ाएँ की। फिर भी उनके विरही मन को लेशमात्र मी सुख की उपलब्धि न हुई। अन्य सामन्त भी अपनी-अपनी रानियों के सङ्ग क्रीड़ा में रत हुए। इस प्रकार बसन्त ऋतु में एक मास तक अनङ्गक्रीड़ा का समारोह चलता रहा। क्रीड़ा की अवधि समाप्त होने पर महाराज मधु अपने महल में आये। उन्होंने समवेत राजाओं को वस्त्राभूषणों से सम्मानित कर विदा कर दिया। किन्तु राजा हेमरथ को बुला कर कृत्रिम स्नेह दर्शाते हुए कहा-'हे मित्र ! कुछ काल पूर्व मैं तुम्हारा अतिथि बना था। उस समय तुम ने मेरा जैसा सम्मान किया था, उस मैं कदापि नहीं भूल सकता / अतएव तुम निःसङ्कोच हो अपनी रानी चन्द्रप्रभा को यहाँ छोड़ जाओ। उसके योग्य आभूषण तैयार होने पर में उसे ससम्मान विदा कर दूँगा।' यद्यपि राजा मधु के शब्द कृत्रिम थे, फिर भी सरल-चित्त राजा हेमरथ को समझ में न आये। उसने अपनी स्वीकृति दे दी। इसके पश्चात उसने आकर रानी चन्द्रप्रभा से कहा-'हे प्रिये / मैं राजा मध से विदा ले चुका है. अतः आज ही वटपुर के लिए प्रस्थान करूँगा। किन्तु तुझे अपने विश्वस्त मन्त्री एवं अन्य सैनिकों की देख-रेख में यहाँ छोड़ जाता हूँ। तुम उपहार में आभूषणादि ले कर यथाशीघ्र मा जाना, क्योंकि राजा Rध की ऐसी ही राय है। उनकी आज्ञा की उपेक्षा करना उचित नहीं है।' राजा का कथन सन कर रानी चन्द्रप्रभा व्याकुल हो गयी। उसने प्रार्थना की-'हे नाथ ! मैं समझती हूँ कि प्रथम तो भाप दुर्भाग्यवश ही मुझे यहाँ लाये हैं एवं अब यहाँ त्याग कर एकाकी लौट रहे हैं। इससे निश्चय है कि कुछ अनर्थ अवश्य होगा। राजा मधु अपनी पत्नी बना कर बलात् मुझे रनिवास में रख लेंगे। अन्त में आप को पश्चात्ताप ही करना पड़ेगा।' चन्द्रप्रभा की माशङ्का पर अब भी राजा हेमरथ को विश्वास न हुआ। उसने कहा-'अरी मढमती। त बड़ी भोली है, तुझे ऐसा नहीं कहना चाहिये / राजा मधु के ऐसे घृणित भाव नहीं है। उनकी चेष्टायें अत्यन्त पवित्र हैं। तम्हें रोक रखने का कारण यह कदापि नहीं हो सकता, बल्कि उनकी आन्तरिक स्नेह भावना है। अतः तुम तनिक भी चिन्ता न करो।' चन्द्रप्रभा ने पुनः निवेदन किया- 'हे स्वामो ! आप राजा मधु के कृत्रिम शिष्टाचार से भ्रमित न होवें. अन्यथा आप पश्चात्ताप करेंगे एवं घोर दुःख उठायेंगे।' इस प्रकार रानी चन्द्रप्रभा ने बहुत समझाया, पर मति Jun une s
SR No.036468
Book TitlePradyumna Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSomkirti Acharya
PublisherJain Sahitya Sadan
Publication Year2000
Total Pages200
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size275 MB
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