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________________ परमात्माओं के पूजन तथा मुनिराजों की सेवा आदि सदनुष्ठानों में श्रद्धान्वित हुए। उसके बाद राजाजी के पूछने पर दमयंती ने जुगार से लेकर अपना सब वृत्तांत कह सुनाया, तब दयार्द्र बने हुए राजा का आंखें आंसुओं से भर आई, रानीजी तथा दमयंती भी पेट मर रोई ' क्योंकि दुखों से भरा हुआ जीव अपने स्नेहीओं के बीच रोये बिना रहता नहीं है / राजाने दमयंती के आंसु अपने वस्त्र से साफ किये और बोले, बेटी ! इस संसार में विधाता से बढ़कर कोई बलवान नहीं हैं। अतः मत रुओ दमयंती भी आश्वासित होकर स्वस्थ बनी / 6. उसी समय एक देव आकाश से नीचे उतर आया और दमयंती को हाथ जोड़कर बोला, भद्रे ! मैं पिगलक नाम का चोर था, इसी राजा से मुझे अभयदान दिलवाया और तुम्हारे आदेशानुसार मैंने दीक्षा स्वीकार की। विहार करता हुआ मैं एक दिन तापसपुर नगर में आया और सांयकाल में स्मशान भूमि पर कायोत्सर्ग की मुद्रा में ध्यानस्थ बना / दूर से जंगल के झाड पानी को साफ करता हुआ भयंकर दावानल मेरे समीप आने लगा और देखते-देखते उसने मुझे भस्मीभूत करने का प्रारंभ किया, परंतु भावसंयम का मालिक बना हुआ मैं धर्मध्यान में स्थिर रहा तथा नमस्कार महामंत्र, भवभवांतर में भी जैन शासन की प्राप्ति, इस भव की अधुरी आराधना आनेवाले भव में पूर्ण करनेवाला बनने पाऊँ इत्यादि शुभ अध्यवसायों में उत्तरोत्तर आगे बढ़ता गया और दावानल से अर्धदग्ध शरीर जमीन पर गिर गया। प्राणच्युत होकर म देवलोक की भूमि में देव बना / उस भूमि में उत्पन्न होनेवाले देवमात्र को सबसे बढ़ा भारी आश्चर्य होता है कि, भौतिकवाद से परिपूर्ण इस भूमि में मैंने कौन से पुण्यकर्मो के कारण जन्म लिया है ? तब वे अपने अवधिज्ञान का उपयोग रखते हैं उसमें जब अपना पूर्व भव दिखता है, तब अपने सुकृत्यों की स्मृति में आनन्द विभोर बन जाते है। मुझे भी अबधिधान से मेरा थव इसतरह याद आया कि, "मैं महाचोर था। सिपाहीयों P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036461
Book TitleNal Damayanti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurnanandvijay
PublisherPurnanandvijay
Publication Year1990
Total Pages132
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size90 MB
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