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________________ विरोध मारकाट तथा हिंसादि कर्म नहीं किये हुए होने से मुझे मरने का भय क्यों लगेगा ? 1 / (4) उपरोक्त वचन बड़ी मक्कमता से कहने पर निर्भय बनी हुई, दमयंतीने पुनः कहा कि, 'हे नराधम राक्षस ! मैं तेरे लिए परस्त्री हूँ अतः मेरा स्पर्श तो दूर रहा परंतु मुझ पर खराब विचार करना भी महापाप है / तमाम धर्माचार्यों ने भी कहा है, अपनी विवाहित पत्नी को छोड़कर दूसरी कन्या, विधवा, सधवा, सहपाठिनी, विद्यार्थीनी शिष्या साली, भाभी, पडोसन तथा विश्वासु स्त्रियां सव परस्त्री है, अतः उनके विश्वास का घात करना ही मृत्यु है, इसलिए मेरा स्पर्श करके तुम स्वय ही मत्य के मेहमान बनने की उतावली मत करो। (5) फिर भी बल जबरी से मेरा स्पर्श किया तो भी राक्षस ! तेरे हाथ में कुछ भी आनेवाला नहीं है। प्रत्युत मेरा भक्षण करते कहीं तुम्हारा ही भक्षण यमराज करने न पावे / हे मूढात्मन् ! ऊपर की सब बातों पर एक वार विचार कर लो, और मेरे ऊपर से नजर हटाओ। इस प्रकार दमयंती की धीर-वीर तथा गंभीर वाणी को सुनकर राक्षस स्वयं ही भयभीत बना और बोला, 'भद्रे !' मैं तुम्हारे पर खुश हूँ। अब वतलाओ कि, मैं तुम्हारा भला कैसे करूँ ? तब दमयंती बोली, देवयोनि के निशाचर / यदि तुम मेरे पर प्रसन्न हो तो अवधिज्ञान का उपयोग रखकर बतलाओ 'मेरे पति नलराजा का संगम मुझे कब होगा?' तब देव बोला है कल्याणी ! जिस दिन से तुम्हारा वियोग हुआ है, तब से द्वादश (बारह). वर्ष पूर्ण होने के पश्चात् जब तुम अपने पिता के घर होगी तब कुशलतापूर्वक तुम्हारा सम्मेलन होगा / अतः धीरज धरना ही उत्तम है / इतना कहकर फिर वोला, यदि तुम मुझे आज्ञा दो तो मैं तुम्हें आंख की पलक मारते ही तुम्हारे पिता के घर 49 P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036461
Book TitleNal Damayanti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurnanandvijay
PublisherPurnanandvijay
Publication Year1990
Total Pages132
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size90 MB
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