SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 55
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मृगांक - चरित्रम् // 54 // ___ अर्थः - त्यां मात-पिताना चरण-कमलने अति प्रेमथी नमीने मृगांके परस्पर मिलन कराव्यु. / / 52 / / स्ववेश्मनि सुखं भुञ्जन् श्रेष्ठः कुसुमसारसूः / तस्थिवान् ललनाद्वन्द्वैः संयुतः स्नेहभाजनैः // 53 // अर्थः-कुसमसार शेठनो पुत्र मृगांककुमार स्नेह करवाने योग्य एवी बन्ने स्त्रीओ साथे पोताना महेलमां सुख भोगवतो थको रह्यो. // 53 // इतश्च. तस्यां वाराणस्यां मकरध्वजो नृपः / वर्तते विश्वविश्वेशः पुत्ररत्नविवर्जितः // 54 // यतः- अर्थः-ते अरसामां वाणारसी नगरीमा जगत्पति एवो मकरध्वज नामे राजा पुत्ररहित हतो. // 54 // केमके ... घरअंगणंमि मसाणं जत्थ न दीसंति धूलिधूसरच्छायं / - अडंति पडंति रडतडाइं दो तिन्नि डिंभाइ न दोसंति // 55 // अर्थ:-जे घरना आंगणामां बे-त्रण छोकरा रखडतां, पडता रडतां अने धूळथी आच्छादित थतां देखातां नथी ते घर | मसाण जेवु देखाय छे. // 55 // एकोऽपि यः सकलकार्यविधी समर्थः, सत्वाधिको भवति किं बहुभिः प्रसूतैः / तारागणः समुदितोऽप्यसमर्थ एव, चन्द्रः प्रकाशयति दिग्मुखमण्डलानि // 56 // // 54 // // BP.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036453
Book TitleMruganka Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRuddhichandraji
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year
Total Pages64
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy