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________________ धर्म- | दक्षिणश्रेण्या / पुरे गगनवाने // 7 // हेमचंद्रान्निधानोऽस्ति / विद्याधरमहाप्रतुः // अहं तु पुः / का त्रिका तस्य / नाम्ना मदनसुंदरी // 4 // मत्पित्रा चान्यदा पृष्टः / सिम्पुत्रो विचक्षणः // यथा स्या मम सत्पुत्र्याः / को भर्ता नविता वद // 4 // ततस्तेन समादिष्टो / रत्नशेखरनंदनः // र लचंद्र इति ख्यातः / कुमारो चुमिगोचरः // 50 // ततोऽहं पुष्णती तंत्र / सत्कलाः सकला थ. वि // संतिष्टामि निजे गेहे / सखीचक्रसमन्विता // 21 // - अन्यदा जानुवेगस्य / पुत्रेणाहं विलोकिता // नानुप्रजानिधानेन / कामांधेन दुरात्मना / // 52 // ततः संहत्य मामत्र / प्रासादे स विमुक्तवान् // स्वयं पुनर्गतः पापो / विद्यासाधनहेतवे // 53 // तथेयं या द्वितीयात्र / कन्यका कनकविः / / पुत्री चंपाधिराजस्य / नाम्ना तु रत्नमेख ला // 55 // एषापि तेन पापेन / ततो हृत्वा उरात्मना / मुक्ता ममांतिके कामं / कामपीमित चेतसा // 55 // तदेष ते मया सर्वः / स्ववृत्तांतो निवेदितः // सांप्रतं श्रोतुमिबामि / गोत्रं नाम च तावकं // 16 // कथयानुग्रहं कृत्वा / कुरुष्व मम निवृति // कुमारोऽपि स्ववृत्तांतं / तस्यै सर्व | न्यवेदयंत // 57 / / श्रुत्वेदमाहतुः कन्ये / समासंदितमानसे // अहो नौ कीदृशं पश्य / सत्क P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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